Category: विरह

  • मैं हारा

    इत्तेफाक सी?
    टूटा सितारा,
    मेरी धूमिल मंज़िल,
    मैं पागल बंजारा।
    मुझे नोच के फेंक दो
    तुम मुझे नोच के फेंक दो
    मैं टूट के गिर जाऊँगा
    मैं कितना घृणित
    मैं बेसहारा।
    तुम जाओ बनो
    अकबर महान
    मैं तुग़लक़ बेचारा
    पढ़ ना पाए तुम
    लिपि मेरी,
    हारा मैं हारा।
    मैं हारा।
    दिशा 🌻

  • मेरी अधूरी झोपड़ी

    तुमने तो बना लिए
    अपने बड़े-बड़े महल।

    मेरी झोपड़ी सूनी,
    मेरा सहन सूना,
    मेरी बाहें सूनी
    मैं कहाँ जाऊँ अब?

    तुमने तो बना लिए न
    अपने बड़े-बड़े महल।

    मेरी झोपड़ी अब
    मेरी लगती नहीं।
    चौखट पर पड़े हैं
    तुम्हारे चप्पल
    कल के खुले,
    जिन पर अभी तक
    पानी के गीले छींटे
    चिपके हैं।

    नीली तौलिया तुम्हारी,
    खटिया के सिरहाने पड़े हैं।
    तकिए के ठीक बगल
    चादर पर
    तुम्हारे आकार की
    कुछ सिलवटें अब भी बची हैं।

    मैं रज़ाई कैसे तह करूँ?

    तुमने तो बना लिए
    अपने बड़े-बड़े महल।

    पलटा मैंने
    उल्टा ही छोड़ दिया,
    कढ़ाई में तेल
    आधा गरम है,
    चिमटा जाने कब
    हाथ से छूटकर
    ज़मीन पर गिरा था।

    बेसन की सब्ज़ी
    अब नहीं बन सकती
    इस झोपड़ी में।

    बेसन तीसरी आलमारी में,
    सबसे ऊपर
    तुमने रख दिया था
    मेरे छोटे-से हाथ
    न तुम तक पहुँचते हैं,
    न बेसन तक।

    तुमने तो बना लिए
    अपने बड़े-बड़े महल।

    मेरी कजरी सूनी,
    मेरी शिकायतें सूनी,
    मेरी नजीबाबाद सूनी,
    मेरा श्रृंगार सूना।

    मेरी अधूरी झोपड़ी
    अब धीरे-धीरे टूट जाएगी।
    कोई कर लेगा क़ब्ज़ा,
    ज़मीन बिक जाएगी।

    और मैं?

    तुम्हारे महल के आगे
    इसी झोपड़ी की बची हुई
    एक मुट्ठी मिट्टी पर
    बैठी रहूँगी

    बस तुम्हारी
    बाट जोहूँगी।
    दिशा 🌻

  • मैं बैरागी हूँ

    मुझे कभी कुछ भी चाहिए ही नहीं था। जो कुछ मिला, उससे भी मेरा कोई मोह नहीं रहा। आज जो मेरे पास है, उसे भी एक क्षण में छोड़ देने में मुझे कोई संकोच नहीं होगा। मैं अपने भीतर किसी आकांक्षा को बचाकर नहीं रखना चाहती।

    मैं बैरागी हूँ।मुझे अपने जीवन को सँवारना नहीं, उससे धीरे-धीरे अलग हो जाना है। न कोई उपलब्धि चाहिए, न कोई पहचान, न अपने होने की कोई गवाही। मुझे अपने जीवन में कोई सुधार नहीं चाहिए; मैं उसे जैसा है, वैसा ही क्षीण होते देख सकती हूँ।

    मुझे रोना भी नहीं है। आँसुओं में भी एक तरह का आग्रह होता है और अब मैं किसी आग्रह के साथ नहीं रहना चाहती।

    मैं बस इतनी-सी हो जाना चाहती हूँ कि मेरा नाम भी मेरे पीछे न बचे। कोई स्मृति नहीं, कोई कथा नहीं, कोई पहचान नहीं, बस एक बेहद गुमनाम-सा नाम, जो कभी था भी या नहीं था, इससे किसी को कोई फ़र्क न पड़े।
    दिशा 🌻

  • मेरी नदी

    एक नदी मेरे मन को सीधा काट, मेरे दिल के दो टुकड़े करते हुए अपना रास्ता बना लेती है। मैं चट्टानों की तरह रास्ता रहगुज़र धीरे धीरे, लम्हा लम्हा छोड़ देता हूँ। मुझे लहर और नहर का फ़र्क़ नहीं पता। मैं बस उसका साहस देख कर रास्ता छोड़ देता हूँ। कभी कभी उसकी तेज़ नाक की याद बहुत सताती है। जब वो गिरती थी मेरे ऊपर, अपना सर्वस्व न्योछावर कर। रातों को वो और जमील हो जाती थी। चाँद की रोशनी में उसकी नाक और कटीली बन मेरे हर रेशे में रास्ता ढूँढने लगती थी। मुझे ख़ुद में और उसमे अंतर बहुत कम समझ आता था। मैं उसका समुद्र तो नहीं था। पर वो मुझमें काफ़ी समा चुकी थीं। मैं आज उसकी कोमल कमर पकड़े उसकी आँखों को याद किया करता हूँ। उसको देखे ज़माना होगया। पर वो तो मेरे पास ही है। पर हाँ ज़माना होगया।उसकी हर उस तेज़ धार, उसके हर उस चोट की कमी मुझे कंकड़ कर रही है। जब वो मेरे साथ थी तो मैं चट्टान था। अब वो आगे जा चुकी है, मैं महज़ कंकड़ बन चुका हूँ। उसकी याद में छुपता हुआ, कहीं गिरता, चोटें खाता, ज़ख़्म बढ़ाता, झुकता हुआ, ख़त्म होता हुआ, मैं। मुझे मेरी नदी की गहराई खा रही है। मैं उससे प्रेम नहीं करता, पर उसकी कलकल से मुझमें उत्तेजना है। वो नापाक नदी अपने क्रोध में मुझे पी जाएगी। मैं धूल बन उसमे समा जाऊँगा। वो मेरे हर रोम में रहते हुए और एक साथ ही मुझे छोड़ कहीं दूर पहाड़ों में अपना घर बनायेगी। मैं कंकड़, राहों में पड़ा उसकी कमर पकड़े, सूखा पड़ने का इंतज़ार करूँगा।
    दिशा 🌻🌻

  • हमारे बीच एक सभ्यता

    तुम्हारे और मेरे बीच
    एक सभ्यता रहती है।
    कुछ जानवर रहते हैं,
    कुछ कीड़े-मकौड़े रहते हैं।

    हम इतने दूर तो कभी नहीं थे
    कि मैं तुम्हें आवाज़ भी न दे सकूँ,
    तुम्हारा होना और न होना
    दोनों नियति हैं।
    तुम कब थे,
    कब नहीं
    यह भी नियति है।

    मैंने गणित पढ़ा,
    पर तुम्हारे बाद
    शून्यता का प्रमाण पाया।

    विज्ञान में अथाह रुचि ली,
    पर कोई ग्रह, कोई चंद्रमा,
    कोई पुच्छल तारा
    तुम तक मेरी आवाज़
    नहीं पहुँचा पा रहा है।

    जब मुझसे
    गणित और विज्ञान
    दोनों के रूपक नहीं बने,
    तो मैंने साहित्य पढ़ा
    तुम्हें अन्तरालों से पुकारा।

    मैंने इतिहास पढ़ा,
    भूगोल पढ़ा,
    सब पढ़ डाला।
    कोई लिपि,
    कोई देश नहीं
    बचा जहाँ मिलना
    संभव रहा हो।

    तुम अपनी सभ्यता में गुम,
    मुझसे पश्चिम की ओर जा रहे हो।
    मैं अपना अंतरिक्ष सँभाले
    अपने इंतज़ार को
    धीरे-धीरे
    जर्जर कर रही हूँ।
    दिशा 🌻

  • जर्जर इंतज़ार

    मेरा लिखा हुआ किसी को नहीं पढ़ना चाहिए।

    मेरे सारे शब्द मलिन हैं। बदहवास, बेहोशी में लिखे हुए इन शब्दों को मैं अपनी ज़बान कहती हूँ? मैं कितना गिर सकती हूँ? मैं कितना चिता-कीड़ा, कितनी असहाय रचना हूँ?

    ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ मानने वालों ने मुझे होश में कलम न चलाने का श्राप दिया है। शायद इसीलिए मैं कभी सीधा नहीं लिख सकती। मेरी हर बात किसी टूटे हुए रास्ते की तरह है, जहाँ पहुँचने से पहले ही अर्थ कहीं पीछे छूट जाता है।

    मैं खो चुकी वह सभ्यता हूँ, जिसने इतिहास में कोई निशान नहीं छोड़ा, विज्ञान को कोई उत्तर नहीं दिया। मुझसे कोई अपठनीय लिपि नहीं मिली। मेरे खंडहरों में किसी पाँच-पैर वाले जीव का जीवाश्म तक किसी खोजी ने नहीं पाया। मेरे होने का कोई प्रमाण नहीं है, सिवाय उन शब्दों के, जिन्हें पढ़ने वाला शायद कभी कोई नहीं होगा।

    मैं किसी औसत-से गाँव की सबसे पुरानी इमारत का वह आँगन हूँ, जहाँ अब कोई बच्चा खेलने नहीं आता।

    पीपल के पेड़ पर अब झूले नहीं डाले जाते। रस्सियाँ गल चुकी हैं। दीवारों का चूना झर चुका है। चौखट पर बैठी धूप भी अब किसी का इंतज़ार नहीं करती।

    मेरा इंतज़ार भी अब जर्जर हो चुका है।इतना जर्जर कि अब आदत और इंतज़ार में फ़र्क़ नहीं है।मुझे कोई नहीं पहचानेगा।और फिर, कोई मेरा लिखा हुआ कुछ पढ़ेगा ही क्यों?किसी को क्या लेना-देना उस सभ्यता से, जो ख़ुद अपने खंडहरों में अपना नाम भूल चुकी हो? खण्डहरों से आँसुओं की बू आती है। मेरे शब्द पड़े रहने दो। किसी पुराने आँगन की धूल की तरह।किसी बंद कमरे में रखी उस किताब की तरह।
    दिशा 🌻

  • खोया हुआ ग्रह

    विचलित मन और
    घबराते हुए चित्त में
    डर और अविश्वास घुल गया है।

    तुम्हारे न होने की अपार पीड़ा
    मेरे दिल को आरी से चीरती हुई
    मेरी सारी धमनियों से
    रक्त चूस रही है।

    मैं अब लिख नहीं पाता
    मेरे शब्द कहीं खो गए हैं।

    मैं एक खोया हुआ ग्रह हूँ,
    पूरे ब्रह्मांड में
    अपना सूर्य ढूँढ़ता हुआ।

    अब तैयार होना नहीं भाता,
    सिर्फ़ लोगों के लिए
    हँसता हूँ
    ज़रूरत से कुछ ज़्यादा।

    मैंने नाखून काट लिए हैं,
    बाल बाँधकर रखता हूँ।
    अब तुम्हारी पसंद के कपड़े नहीं पहनता।
    रंगों के बीच रहते हुए भी
    मैं एक बदरंग परिंदा हूँ।

    बारिश में नहीं भीगता,
    चिड़ियों के साथ नहीं खेलता।
    सड़क पर आते-जाते लोगों से
    अब कोई बात नहीं करता।

    रेडियो नहीं सुनता,
    किताबें नहीं पढ़ता।
    अब किसी भी नुमाइश में जाना
    एक गुनाह-सा लगता है।

    बाहर निकलना अब पसंद नहीं।
    इतनी जड़ता है भीतर
    कि मधुमक्खियाँ भी
    मेरे सन्नाटे में
    अपना छत्ता बना सकती हैं।

    मुझे किसी की शक्ल नहीं भाती,
    न किसी की बोली।
    हर आवाज़
    मेरे भीतर कुछ और तोड़ जाती है।

    मैं अपने रोशनदान के सामने
    अपनी ही शक्ल रखकर
    दिन काटता हूँ

    और शाम होते-होते
    उस चेहरे से भी
    नज़रें चुराने लगता हूँ।
    दिशा 🌻

  • उदासी की गवाही

    उदासी ओढ़े सड़क पर निकलना कितना आसान है। आपको कोई निहार रहा है या नहीं, इससे आपको रत्ती भर फ़र्क़ पड़ना बंद हो जाता है। आपको सब कुछ सबसे पहले पता चलता है और आप बेख़बर, बेख़ौफ़, ख़ुद को धीरे-धीरे खोने में जुटी होती हैं। घनघोर उदासी ओढ़ लेने से आदमी मरता नहीं है। यह एक सज़ा है। मरता क्यों नहीं है? क्योंकि वह मरना चाहता नहीं है। वह उस कीड़े-सा तड़पता हुआ साँस लेता है, जो अपनी ही नियति में फँस गया हो।

    जब मैं उदासी की सारी सीमाएँ लाँघकर छटपटा रहा होता हूँ, तो सबसे पहले टूटते हैं मेरे ये लंबे, कटीले, रंग-बिरंगे नाखून। महीनों से सँजोकर उन्हें मैंने सींचा था।मेरे छोटे-से हाथों पर मेरा सबसे बड़ा श्रृंगार। न जाने कैसे मेरी उदासी का सबसे पहला पैग़ाम इन्हीं मृत कोशिकाओं तक पहुँचता है। आधे-तिहाई टूटे, दाँतों से चबाए गए, कहीं ठोकर खाए हुए, मेरे ये सुंदर नाखून चुपचाप मेरी उदासी की गवाही देते रहते हैं।
    खो जाती हैं मेरी चाँद बालियाँ। मेरे श्रृंगार की द्योतक, म मेरे चेहरे पर टँगे दो छोटे-से चाँद। मैं उन्हें जगह-जगह ढूँढती फिरती हूँ और फिर उन्हें अपने ही गिरेबान में खो देती हूँ। घर के हर कोने में अपनी पूरी शिद्दत से उन्हें तलाशती हूँ और अंततः पा लेती हूँ। शायद इसलिए कि मैं ऊपर से हिमालय की बर्फ़ की चादर ओढ़े, भीतर से ज्वालामुखी जैसी लड़ाकू हूँ। मैं किस्मत से लड़कर अपनी चाँद बालियाँ वापस ले आती हूँ। हालाँकि उस लम्हे तक उनका होना और न होना, दोनों एक बराबर हो चुके होते हैं।

    फिर टूटने लगते हैं मेरे ये आधे-पके बाल। लंबे बालों के शौक़ में रोज़ तेल लगाकर, गूँथकर बनाई गई चोटियों के मेरे सारे प्रयत्न एक-एक करके नीम की डालियों की तरह मेरे सामने बिखरकर मेरी खिल्ली उड़ाते हैं। मैं और उदासी ओढ़ लेती हूँ। रोती हूँ, बिलखती हूँ, मगर काले बाल मुझे और मेरे सफ़ेद बालों को छोड़कर ज़मीन पर बिखरे पड़े रहते हैं।

    मेरी सारी किताबें मुझसे रूठ जाती हैं।जिन किताबों के पन्नों पर मैंने महीनों उँगलियाँ फिराई थीं, जिनमें जगह-जगह पेंसिल से निशान लगाए थे, वे बंद पड़ी रहती हैं। कोई पात्र मुझे पुकारता नहीं। कोई कविता मुझे अपने भीतर जगह नहीं देती। मेरी मेज़ पर रखी अधूरी डायरी सबसे ज़्यादा निर्दयी होती है। मुझे उससे और उसे मुझसे जैसे घृणा-सी होने लगती है।

    मैं खोया हुआ वह प्रेमपत्र बन जाता हूँ, जो अपने ही शब्दों के बीच कहीं धुँधला पड़ता जा रहा है।अब मैं वह जंतु हूँ जो दिशाहीन अँधेरे की तलाश में निकल आया है।मुझे सड़क पर चलने दो।गिर जाने दो।कुछ देर यूँ ही भटकने दो।उदासी मुझे मरने नहीं देगी।
    दिशा 🌻

  • गुलशन का भ्रम

    हमने एक दुनिया बनाई।

    उसे अपने भीतर पाला, अपनी हथेलियों से सींचा, रोज़ थोड़ा-सा ख़ुद उसमें मिलाया। मोहब्बत की खाद डाली, इंतज़ार का पानी दिया और देखते-देखते एक बंजर ज़मीन पर हमारा गुलशन उग आया। मीलों तक फैला हुआ। किसी जादू से निकला हुआ कोई अजूबा।

    हमने उसमें फूल लगाए, कुछ काँटेदार, कुछ चमकीले, कुछ ख़ुशबू में डूबे हुए, कुछ रंगों से मदहोश और कुछ ऐसे जिनके बारे में हमने पहले कभी सोचा भी नहीं था। हर सुबह उसे मोहब्बत की रौशनी से नहलाया। तिश्नगी के बीज डाले। सूखी पत्तियों की छँटाई की। ख़राब मौसमों को बर्दाश्त किया। धीरे-धीरे एक मुकम्मल कायदा-ए-बागबानी ज़िंदगी बन गई।

    हमने रेत पर रास्ते खींचे। रेगिस्तान के सीने में पानी के फ़व्वारे रखे। दूर दूर तक फूल उगाए। मुलाक़ातों की क्यारियाँ बनाते गए, इंतज़ार की मिट्टी पलटते गए और बाग-ए-गुलशन, बढ़ता गया।

    फिर एक दिन पन्नों के बीच एक गुमसुम-सा फूल रख देने का दिल हुआ। बगीचे की तरफ़ दौड़े। सबसे ख़ूबसूरत फूल चुना। एक ऐसा फूल जिसे किसी किताब के बीच दबाकर रखा जा सके, ताकि लौटकर कभी उसे खोला जाए तो उसकी ख़ुशबू से पूरी दुनिया फिर से आबाद हो…

    मगर कोई फूल नहीं टूटा।

    कोई शाख़ नहीं झुकी। कोई पत्ती नहीं हिली। बगीचे ने कोई जवाब नहीं दिया।

    बंजर में खिला वह फूल किताब के पन्नों तक आते-आते कहीं ग़ायब हो गया।

    हमने किताब बंद की। आँखें खोलीं। और सबसे पहले अपने गुलशन का भ्रम तोड़ा।
    एक तवील जुमला पढ़ा और हम सराब की तलाश में निकल पड़े।
    दिशा 🌻

  • सूरत-ए-हाल की क़बूलियत

    मोहब्बत से बड़ा क्या है? क्या कभी कुछ मोहब्बत से वसीअ हो सकता है? क्या किसी रूहानी या जिस्मानी चीज़ का कोई वुजूद है, जो मोहब्बत से आगे ठहर सके?

    मोहब्बत के नाज़ुक बाज़ुओं में सिमटे सुकून, उसकी पुरज़ोर बेचैनी और बेतकल्लुफ़ जुनून के सामने इस अज़ीम ज़मीन और आसमान में कुछ और तलाशना कितना दुश्वार है। हर लम्हे का पागलपन, हर सुपुर्दगी, हर वहशीपन, हर उनसीयत, वो जुनून, वो जज़्बात, कितने अज़ीज़, कितने बेपरवाह और कितने मुकम्मल।

    मोहब्बत से अज़ीम कुछ भी नहीं।

    कुछ भी नहीं।

    सिवाय सूरत-ए-हाल की क़बूलियत के।

    दिशा 🌻