नाकामयाब

दिशा की खींची हुई ग्रेस्केल तस्वीर: टूटी-फूटी ज़मीन और तिरपाल के बीच से उगते छोटे फूल

मैं भागते-भागते थककर बैठ गया हूँ। अब नाकामयाबी से डर नहीं लगता। शायद इसलिए कि मैं इतना नाकाम हो चुका हूँ कि अब कामयाब होने का ढोंग करने लगा हूँ। चेहरे पर एक तसल्ली रखता हूँ,जैसे कुछ भी ऐसा नहीं था जिसे बचाया जा सकता था।

ज़िंदगी में नाकाम आदमी भी ख़ुश हो सकता है। हाथ मिला सकता है, तोहफ़े ले सकता है, महफ़िलों में हँस सकता है। अपनी बर्बादी को तहज़ीब से छिपाकर दुनिया के साथ बैठ सकता है। कोई देख भी नहीं पाता कि उसके भीतर क्या-क्या मर चुका है। शायद मर जाने के बाद चीज़ें इतनी ख़ामोश हो जाती हैं कि उनके जाने का किसी को पता ही नहीं चलता।

तुमसे शिकायत हुआ करती थी मुझे। बहुत-सी। अब वो भी ख़त्म हो गई हैं। मैं आज भी नाराज़ होना चाहता हूँ। चाहता हूँ कि तुम्हारे ख़िलाफ़ मेरे भीतर कुछ तो बचा रहे। कोई इल्ज़ाम, कोई तल्ख़ी, कोई अधूरा हिसाब। शायद अपनी नाकामयाबी को मुकम्मल करने के लिए मुझे तुमसे नफ़रत करनी चाहिए।

मगर मैं नाराज़ कम, हैरान ज़्यादा हूँ। अपनी ही मूर्खता पर। अपने यक़ीन पर। उस मासूमियत पर, जिसे मैं कभी अपना सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा समझता था।
मगर मेरी प्रतिभा को शायद यह भी गवारा नहीं कि मैं एक साधारण नाकाम आदमी की तरह टूट जाऊँ। उसे मेरी बर्बादी में भी कुछ असाधारण चाहिए।

तो अब मैं मैं हूँ।

चंचल।
चकित।
मौन।

मेरी नाकामयाबी का जश्न सब मना रहे हैं। मैं भी ख़ुश हूँ। कुछ जनाज़ों में रोने की इजाज़त नहीं होती। और कुछ मौतें ऐसी होती हैं जिनके बाद दुनिया तुम्हें मुबारकबाद देने आती है।

फ़रेब के इस जाल से निकलकर आज़ाद हुआ हूँ मैं। अब किसी भ्रम का क़र्ज़ नहीं, किसी उम्मीद की किश्त नहीं, किसी ख़ूबसूरत झूठ को सच साबित करने की ज़िम्मेदारी नहीं।

मैं अपनी नाकामयाबी के चरम पर हूँ।

और यहाँ पहुँचकर एक अजीब-सी राहत मिलती है। जैसे अब खोने को कुछ बचा ही नहीं। जैसे आदमी अपनी आख़िरी उम्मीद भी दफ़्न कर दे, तो दुनिया की कोई ताक़त उसे फिर से मायूस नहीं कर सकती।

कभी मैं कितना निःस्वार्थ था।
कितना सफ़ेद।
कितना कोमल।
नाकामयाबी ने मुझे दुनिया सिखा दी है। अब मैं लोगों की ख़ामोशी में उनका मतलब पढ़ लेता हूँ। मुस्कुराहटों के पीछे छिपे हुए हिसाब समझता हूँ। जानता हूँ कि हर हाथ मिलाने वाला तुम्हारा हमसफ़र नहीं होता और हर तोहफ़े के साथ कुछ न कुछ लौटाने की उम्मीद बँधी होती है।

मैं अब दुनियादार हूँ।

लेन-देन समझता हूँ।
रिश्तों में नफ़ा-नुक़सान देखता हूँ।
अपने हिस्से का फ़ायदा माँगता हूँ।
और जहाँ ज़रूरी हो, वहाँ ख़ामोश रहकर अपना काम निकाल लेता हूँ।
मैं अब व्यापार करता हूँ।
तुम्हारी तरह।
दिशा 🌻

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