तुम्हारे और मेरे बीच
एक सभ्यता रहती है।
कुछ जानवर रहते हैं,
कुछ कीड़े-मकौड़े रहते हैं।
हम इतने दूर तो कभी नहीं थे
कि मैं तुम्हें आवाज़ भी न दे सकूँ,
तुम्हारा होना और न होना
दोनों नियति हैं।
तुम कब थे,
कब नहीं
यह भी नियति है।
मैंने गणित पढ़ा,
पर तुम्हारे बाद
शून्यता का प्रमाण पाया।
विज्ञान में अथाह रुचि ली,
पर कोई ग्रह, कोई चंद्रमा,
कोई पुच्छल तारा
तुम तक मेरी आवाज़
नहीं पहुँचा पा रहा है।
जब मुझसे
गणित और विज्ञान
दोनों के रूपक नहीं बने,
तो मैंने साहित्य पढ़ा
तुम्हें अन्तरालों से पुकारा।
मैंने इतिहास पढ़ा,
भूगोल पढ़ा,
सब पढ़ डाला।
कोई लिपि,
कोई देश नहीं
बचा जहाँ मिलना
संभव रहा हो।
तुम अपनी सभ्यता में गुम,
मुझसे पश्चिम की ओर जा रहे हो।
मैं अपना अंतरिक्ष सँभाले
अपने इंतज़ार को
धीरे-धीरे
जर्जर कर रही हूँ।
दिशा 🌻
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