उदासी की गवाही

उदासी ओढ़े सड़क पर निकलना कितना आसान है। आपको कोई निहार रहा है या नहीं, इससे आपको रत्ती भर फ़र्क़ पड़ना बंद हो जाता है। आपको सब कुछ सबसे पहले पता चलता है और आप बेख़बर, बेख़ौफ़, ख़ुद को धीरे-धीरे खोने में जुटी होती हैं। घनघोर उदासी ओढ़ लेने से आदमी मरता नहीं है। यह एक सज़ा है। मरता क्यों नहीं है? क्योंकि वह मरना चाहता नहीं है। वह उस कीड़े-सा तड़पता हुआ साँस लेता है, जो अपनी ही नियति में फँस गया हो।

जब मैं उदासी की सारी सीमाएँ लाँघकर छटपटा रहा होता हूँ, तो सबसे पहले टूटते हैं मेरे ये लंबे, कटीले, रंग-बिरंगे नाखून। महीनों से सँजोकर उन्हें मैंने सींचा था।मेरे छोटे-से हाथों पर मेरा सबसे बड़ा श्रृंगार। न जाने कैसे मेरी उदासी का सबसे पहला पैग़ाम इन्हीं मृत कोशिकाओं तक पहुँचता है। आधे-तिहाई टूटे, दाँतों से चबाए गए, कहीं ठोकर खाए हुए, मेरे ये सुंदर नाखून चुपचाप मेरी उदासी की गवाही देते रहते हैं।
खो जाती हैं मेरी चाँद बालियाँ। मेरे श्रृंगार की द्योतक, म मेरे चेहरे पर टँगे दो छोटे-से चाँद। मैं उन्हें जगह-जगह ढूँढती फिरती हूँ और फिर उन्हें अपने ही गिरेबान में खो देती हूँ। घर के हर कोने में अपनी पूरी शिद्दत से उन्हें तलाशती हूँ और अंततः पा लेती हूँ। शायद इसलिए कि मैं ऊपर से हिमालय की बर्फ़ की चादर ओढ़े, भीतर से ज्वालामुखी जैसी लड़ाकू हूँ। मैं किस्मत से लड़कर अपनी चाँद बालियाँ वापस ले आती हूँ। हालाँकि उस लम्हे तक उनका होना और न होना, दोनों एक बराबर हो चुके होते हैं।

फिर टूटने लगते हैं मेरे ये आधे-पके बाल। लंबे बालों के शौक़ में रोज़ तेल लगाकर, गूँथकर बनाई गई चोटियों के मेरे सारे प्रयत्न एक-एक करके नीम की डालियों की तरह मेरे सामने बिखरकर मेरी खिल्ली उड़ाते हैं। मैं और उदासी ओढ़ लेती हूँ। रोती हूँ, बिलखती हूँ, मगर काले बाल मुझे और मेरे सफ़ेद बालों को छोड़कर ज़मीन पर बिखरे पड़े रहते हैं।

मेरी सारी किताबें मुझसे रूठ जाती हैं।जिन किताबों के पन्नों पर मैंने महीनों उँगलियाँ फिराई थीं, जिनमें जगह-जगह पेंसिल से निशान लगाए थे, वे बंद पड़ी रहती हैं। कोई पात्र मुझे पुकारता नहीं। कोई कविता मुझे अपने भीतर जगह नहीं देती। मेरी मेज़ पर रखी अधूरी डायरी सबसे ज़्यादा निर्दयी होती है। मुझे उससे और उसे मुझसे जैसे घृणा-सी होने लगती है।

मैं खोया हुआ वह प्रेमपत्र बन जाता हूँ, जो अपने ही शब्दों के बीच कहीं धुँधला पड़ता जा रहा है।अब मैं वह जंतु हूँ जो दिशाहीन अँधेरे की तलाश में निकल आया है।मुझे सड़क पर चलने दो।गिर जाने दो।कुछ देर यूँ ही भटकने दो।उदासी मुझे मरने नहीं देगी।
दिशा 🌻

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