विचलित मन और
घबराते हुए चित्त में
डर और अविश्वास घुल गया है।
तुम्हारे न होने की अपार पीड़ा
मेरे दिल को आरी से चीरती हुई
मेरी सारी धमनियों से
रक्त चूस रही है।
मैं अब लिख नहीं पाता
मेरे शब्द कहीं खो गए हैं।
मैं एक खोया हुआ ग्रह हूँ,
पूरे ब्रह्मांड में
अपना सूर्य ढूँढ़ता हुआ।
अब तैयार होना नहीं भाता,
सिर्फ़ लोगों के लिए
हँसता हूँ
ज़रूरत से कुछ ज़्यादा।
मैंने नाखून काट लिए हैं,
बाल बाँधकर रखता हूँ।
अब तुम्हारी पसंद के कपड़े नहीं पहनता।
रंगों के बीच रहते हुए भी
मैं एक बदरंग परिंदा हूँ।
बारिश में नहीं भीगता,
चिड़ियों के साथ नहीं खेलता।
सड़क पर आते-जाते लोगों से
अब कोई बात नहीं करता।
रेडियो नहीं सुनता,
किताबें नहीं पढ़ता।
अब किसी भी नुमाइश में जाना
एक गुनाह-सा लगता है।
बाहर निकलना अब पसंद नहीं।
इतनी जड़ता है भीतर
कि मधुमक्खियाँ भी
मेरे सन्नाटे में
अपना छत्ता बना सकती हैं।
मुझे किसी की शक्ल नहीं भाती,
न किसी की बोली।
हर आवाज़
मेरे भीतर कुछ और तोड़ जाती है।
मैं अपने रोशनदान के सामने
अपनी ही शक्ल रखकर
दिन काटता हूँ
और शाम होते-होते
उस चेहरे से भी
नज़रें चुराने लगता हूँ।
दिशा 🌻
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