Category: बयाँ

  • तुम्हारे बाज़ुओं के सिरहाने

    मैं थक जाती हूँ,
    तुम्हारी आवाज़ के इंतज़ार में,
    नामौजूदगी के सूनेपन से भरे चौबीस घंटे,
    ख़ुद को खर्च करते समाप्त करती,
    एक दिए की बाती खो गयी है।
    जलते बुझते चीखते खोजते
    बाजू बंद नोच के फेंक दिया है
    त्योरियाँ चढ़ी रखीं है।
    तुम्हारे बाज़ुओं के सिरहाने
    मेरा सुकून रह गया है।
    दिशा 🌻

  • अहम्

    अहम् की प्राप्ति में,
    सत्तर प्रतिशत खर्च हो चुका हूँ।
    अब पूरा का पूरा समुंदर बनाने,
    और एक बूँद समान उसमे,
    अपनी हस्ती मिटा देने में
    कोई अंतर नहीं बचा है।

    मैं कतरा कतरा
    अपनी ज़िन्दगी उजाड़ रहा हूँ
    आशा के भ्रम में हूँ।
    मैं निराशा की चादर ओढ़े,
    शून्य में निहारता,
    मुक्तिबोध का इंतज़ार कर रहा हूँ।

    बचे तीस प्रतिशत अहम् को
    मैंने बचा के रखा है।
    तुम्हारे इंतज़ार में
    पथरायी आँखों के त्रिभुज पर
    मेरा एक कतरा आँसू
    अभी भी झुर्रियों की सीढ़ियाँ
    नहीं उतर रहा है।

    जिस दिन तुम्हारे होने का कच्चा
    सपना टूट के मेरी
    सबसे सुंदर मोती वाली माला की तरह
    हम दोनों के हाथ से सजाए
    हमारे बगीचे के बीच
    टूट के पूरी तरह बिखर जाएगा
    अहम् पूरा खर्च हो जाएगा ।

    दिशा 🌻

  • कोख

    कोख

    दिशा अपनी माँ के साथ, श्वेत-श्याम तस्वीर

    मुझको कलम पकड़ना सिखाते वक्त,
    तुम्हारी कलम भी तो छूट रही थी, माँ।

    तुम्हारी कोख ने एक कल्पना रची,
    तुम्हें पता था,
    दुनिया उस कल्पना का बोझ नहीं झेल पाएगी।

    फिर तुमने काया रची,
    और काया को ही दुनिया बना दिया।

    तुमने आँखें दीं, कान दिए, भौंहें दीं, मस्तक दिया,
    तुमने कल्पना को देह की शीशी में महफ़ूज़ कर,
    दुनिया में भेज दिया।

    दुनिया तुम्हारी कोख-सी सुंदर नहीं थी, माँ,
    पर तुम्हारे नरम हाथ थे,
    उन हाथों के नीचे
    हर दुनिया सुंदर लगती थी।

    तुमने मासूम अपनी किताब-ए-ज़िंदगी बंद कर,
    मेरी तक़दीर को सुर्ख़ लिखा।

    मेरी किताबों को संजोते-संजोते,
    तुम्हारे हाथों ने काली स्याही की चादर ओढ़ ली,
    और मुझे
    तारों से बातें करने की औक़ात दे दी।

    मैंने कई आसमान देखे,
    प्रेत-परियों की कहानियाँ सुनीं, सुनाईं,
    अंतरिक्ष देखा, संविधान देखा,
    ख़्वाबों का मरकब मकान देखा।

    पर जब भी देह को कल्पना पुकारती है,
    तुम्हारी कोख याद आती है।

    मैं फिर वही जंतु बन जाना चाहता हूँ,
    जो सैकड़ों नलियों से,
    तुम्हारी कोख में पनप रहा था।
    वही मेरी असली दुनिया है।

    मुझे अपनी कोख में छुपा लो, माँ।
    तुम जो खाओ, वही खिलाओ,
    तुम जो पियो, वही पिलाओ।

    देह को ओढ़े आई यह आज़ादी,
    मेरी कल्पना के कंधे
    संभाल नहीं पा रहे।

    मेरा काल्पनिक "मैं"
    आज भी तुम्हारी कोख में ही साँस लेता है, माँ!
    दिशा 🌻

  • तितली

    सुनहरी गुम इक शाम
    मरे हुए आकाशीय पदार्थ
    बिखरी रोशिनी के टुकड़े
    चाँदनी सी चमकती आँखें।

    कुछ ढूँढती पलकें भौहें
    कुछ नमी जमी रूह
    गले तक रुके लफ़्ज़
    स्वेटर से झाँकती उँगलियाँ।

    चंचल हवा मदमस्त चाल
    अंजान रुख बेगानी दिशा
    धब्बे धारियाँ लैश चाँद
    अनंत आखेट शून्य क्षितिज।

    सफ़ेद बीच कड़े बाल
    स्लेटी साड़ी रजत घड़ी
    चौड़े माथे काली बिन्दी
    पतली पाजेब ऊँची जूती।

    गहरी माथे की रेखाएँ
    काली आधी बिखरी शॉल
    तन को ढकती चाँदनी
    सिमटा बदन बिखरा रूप।

    गुज़रती रेल थरथराता पुल
    चमकता शीशे का ग्लास
    डोलती बर्फ हथेली व्हिस्की
    ढलती उमर चढ़ता नशा।

    शून्य निहारते पथराये नैन
    कावेरी में डोलता प्रतिबिंब
    जलमग्न उतरती अदृश्य सीढ़ियाँ
    मंद लहरों का वाद विवाद।

    अपनाने की छमता दृढ़य
    स्थिरता का अविचलित विवेक
    सोयी सी लाल नाक
    खूबसूरत बेरुखी सी रात।

    ठहरा हुआ भागता वक़्त
    सुइयों से चुराए सेकंड
    दौड़ती ज़िंदगी शीतल पंजे
    उलझा और खूबसूरत अंत।
    दिशा🌻

  • स्याही

    सत्य ये है
    कि तुम पढ़ो
    इसलिए लिखती हूँ मैं।

    अनेकों किताबों के बीच
    एक छोटी सी कविता मेरी भी पड़ी हो
    तुम्हारी लाइब्रेरी में।

    जब ज़िंदगी से थक के आओ
    किताबों के हुजूम में खड़े हो
    पढ़ना क्या है समझ ना पाओ।

    मेरी कविता तुम्हें
    मेरी आँखों सी ही पुकारे
    तुम दिन भर की थकान पहला शब्द पढ़ के मिटा दो।

    मेरी काजल पेंसिल सा बुकमार्क हो तुम्हारा
    मेरे गजरे की सुगन्ध हर पन्ने से आए
    मेरे कानों के कुंदन से बिखरे हो शब्द इधर उधर।

    तुम पन्ने पलटो,
    वो छोटी कविता पढ़ो
    जो तुम पहले हस के टाल दिया करते थे।

    क्युकी

    मेरे लिखने का बस एक ही सिद्धांत है
    मेरे जीवन का बस एक उद्देश्य
    की मैं जो लिखू
    तुम पढ़ो।
    कोई उसे देखे ना देखे
    तुम पढ़ो।
    दिशा 🌻

  • मेरी कोई हद नहीं

    मेरी हद ये है कि
    मेरी कोई हद नहीं
    ना प्यार में ना इकरार में
    दुश्मनी में दोस्ती में
    मेरी कोई हद नहीं।
    जितना सुकून खुद को बना देने में है
    शायद उतना ही पूरी तरह मिटा देने में भी।
    ये इतिहास में ईंसाफ़ में ताकीज़े
    इकरार में फनकार में
    मेरी कोई हद नहीं है।

    मैं जगह जगह जाऊँ हाथ मिलाऊँ
    सब सबके मुताबिक लिख दूँ
    लोग तमीज़दार बोले गाली गलौच करें,
    मुझे इंसानियत की हद याद दिलाए
    पर मैं हद ना खोज पाऊँ।

    ना जाने कहाँ गिरूँ
    कंकड़ खाऊँ लोग भगायें
    फ़कीर बन चौखट चौखट
    अल्लाह से खुद को माँगूँ
    लोग पागल का दर्जा दे
    सिर फोड़ दे दूर भगां
    बेहद का सिरफिरा घूम रहा है गाँव गाँव
    पर मैं अपनी हद ना खोज पाऊँ।

    शायद,
    मेरी हद ये है
    कि मेरी कोई हद नहीं।
    ना इंसानियत में ना हैवानियत में
    ना बुद्ध में ना कृष्ण में।
    मेरी कोई हद नहीं है।

    दिशा 🌻

  • बेपरवाह

    बहुत अपने से बहुत पराए तुम
    नरम थे सख्त थे
    तुम रात की वो आवारा हवा थे
    बालों पे पड़ती वो अल्हड़ आज़ादी तुम
    ख़ाली सड़क पे पीछे भागते वो पेड़ वो लोग
    वो व्यस्थ रातों की ख़ाली अधूरी नींद थे
    समय के घरौंदों से कोसों दूर
    तुम्हारा घर था
    तुम्हें वहाँ अकेले रहना पसंद नहीं था
    पागल आवारा नादान
    चंचल चितवन बेपरवाह
    तुम थे।
    हर बात पे हँसते थे
    हर बात पे यूँ ही कुछ भी
    बेहद छोटी सी बात पे रूठ जाते थे
    तुम बहुत सुंदर थे
    इतने ज़िम्मेदार
    उससे थोड़ा सा ही ज़्यादा लापरवाह
    तुम्हारी हर अदा के पीछे एक राज था
    मेरी कल्पना को जैसे किसी ने
    आकाश से बुला धरती पे सजाया था।
    दिशा 🌻

  • जूतों की याद

    ख़ुद को खोजने की इस मुठभेड़ में
    मैं नंगे पाओं घर से निकल आया।
    इधर भागा उधर दौड़ा
    बिजली के तारों सी उलझी गलियाँ
    गिरते पड़ते चोटिल उठते बैठते
    जूतों की याद हमेशा आती रही।

    लाखों कंकड़ लड़े,
    कोमल तलुए छिल गए
    गोरे गोरे नन्हे पैरों पे
    काले धब्बे बड़े बड़े छाले से
    जूतों की याद हमेशा आती रही।

    सूजे पैर जब उठ ना सके
    चल ना पाया जब मैं इंच भर
    खड़ा ना हो पाया एक पैर पे
    उचका लड़खड़ाया गिरा मुंह के बल
    जूतों की याद हमेशा आती रही।

    किसी ने ना पूछी कुर्सी,
    पेड़ों तक ने डालियाँ समेट ली,
    लहूलुहान पाओं मेरे
    कतरा कतरा ढूँढते रहे धरती
    जूतों की याद हमेशा आती रही।

    मैं बेहोश अधमरा अब अपने पहाड़ पे खड़ा था
    मेरे तलुए के मांस से हड्डियां झाँक रही थी
    मैं अब उस मंज़िल की हवा में साँस ले रहा था
    पैर बचें थे या नहीं अब फ़र्क़ पड़ता नहीं था
    मैं ना जाने और कितने मील दौड़ सकता था
    जूतों की मुझे ज़रूरत नहीं थी।
    दिशा 🌻

  • आँखों से ही सही

    महफ़िल में जब भी बात तेरे आँखों की हुई,
    मैं चुप रही ।
    चुप रही मैं,
    तेरी आँखों का ज़िक्र जब जब हुआ।
    भूरे रंग को कला बताया गया।
    मद्धम होती पुतलियों की गहराई भी
    कुछ फीट कम बतायी गई।
    पर मैं चुप रही।
    चुप रही हर उस बैठक में
    जहाँ जहाँ तेरी पलकें कुछ कम गिनायीं गईं।
    तेरी नज़रों पे जहाँ किए गए
    अनेकों प्रश्न उत्तर।
    कमी है, हाँ कुछ तो कमी है,
    इन नैन नक्शों के भीतर।
    पर मैं चुप रही।

    पर जब बोला गया कि तू आँखों से नहीं बोलता,
    मैं ख़ुद को रोक ना पायी।
    मैं बोली, मैंने सुना है।
    उनका गुनगुनाना, बेवजह मुस्कुराना।
    मैंने सुना है।
    उनका रूठना, उनका मनाना।
    मैंने सुना है।
    उनकी अपील, उनका हट्ठ।
    सुना है,
    उनका गुस्सा, उनका प्रेम।
    मैंने सुना है,
    वो सब वो जो दुनिया को नहीं बताती।
    मैंने सुना है,
    आँखों से ही सही।
    पर मैंने सुना है।
    दिशा 🌻

  • आँचल

    व्यंग पढ़ा तो दुख याद आया,

    हर  मज़ाक़ के पीछे का दर्द 

    हर ठहाके के पीछे का कृदन

    हर टेढ़ी कही गई बात का

    सीधा सा सरल दुख।

    प्रेम पढ़ा तो दुख याद आया

    हर स्पर्श के साथ की  चुभन 

    हर स्मृति के पीछे की लालसा 

    हर  सुध की जीवंत कामना का 

    सीधा सा सरल दुख।

    वीर को पढ़ा तो दुख याद आया

    हर विजय के साथ का त्याग 

    हर त्याग के पीछे की परिकथा 

    हर जीते जागते आघात का

    सीधा सा सरल दुख|

    रौद्र पढ़ा तो दुख याद आया।

    हर भृकुटि की रेखा का दर्द 

    हर आक्रोश के पीछे की बेचैनी 

    हर निर्माता को आँचल में समेटे 

    सीधा सा सरल दुख ।

    दिशा 🌻