तुमने तो बना लिए
अपने बड़े-बड़े महल।
मेरी झोपड़ी सूनी,
मेरा सहन सूना,
मेरी बाहें सूनी
मैं कहाँ जाऊँ अब?
तुमने तो बना लिए न
अपने बड़े-बड़े महल।
मेरी झोपड़ी अब
मेरी लगती नहीं।
चौखट पर पड़े हैं
तुम्हारे चप्पल
कल के खुले,
जिन पर अभी तक
पानी के गीले छींटे
चिपके हैं।
नीली तौलिया तुम्हारी,
खटिया के सिरहाने पड़े हैं।
तकिए के ठीक बगल
चादर पर
तुम्हारे आकार की
कुछ सिलवटें अब भी बची हैं।
मैं रज़ाई कैसे तह करूँ?
तुमने तो बना लिए
अपने बड़े-बड़े महल।
पलटा मैंने
उल्टा ही छोड़ दिया,
कढ़ाई में तेल
आधा गरम है,
चिमटा जाने कब
हाथ से छूटकर
ज़मीन पर गिरा था।
बेसन की सब्ज़ी
अब नहीं बन सकती
इस झोपड़ी में।
बेसन तीसरी आलमारी में,
सबसे ऊपर
तुमने रख दिया था
मेरे छोटे-से हाथ
न तुम तक पहुँचते हैं,
न बेसन तक।
तुमने तो बना लिए
अपने बड़े-बड़े महल।
मेरी कजरी सूनी,
मेरी शिकायतें सूनी,
मेरी नजीबाबाद सूनी,
मेरा श्रृंगार सूना।
मेरी अधूरी झोपड़ी
अब धीरे-धीरे टूट जाएगी।
कोई कर लेगा क़ब्ज़ा,
ज़मीन बिक जाएगी।
और मैं?
तुम्हारे महल के आगे
इसी झोपड़ी की बची हुई
एक मुट्ठी मिट्टी पर
बैठी रहूँगी
बस तुम्हारी
बाट जोहूँगी।
दिशा 🌻
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