मेरा लिखा हुआ किसी को नहीं पढ़ना चाहिए।
मेरे सारे शब्द मलिन हैं। बदहवास, बेहोशी में लिखे हुए इन शब्दों को मैं अपनी ज़बान कहती हूँ? मैं कितना गिर सकती हूँ? मैं कितना चिता-कीड़ा, कितनी असहाय रचना हूँ?
ख़ुद को सर्वश्रेष्ठ मानने वालों ने मुझे होश में कलम न चलाने का श्राप दिया है। शायद इसीलिए मैं कभी सीधा नहीं लिख सकती। मेरी हर बात किसी टूटे हुए रास्ते की तरह है, जहाँ पहुँचने से पहले ही अर्थ कहीं पीछे छूट जाता है।
मैं खो चुकी वह सभ्यता हूँ, जिसने इतिहास में कोई निशान नहीं छोड़ा, विज्ञान को कोई उत्तर नहीं दिया। मुझसे कोई अपठनीय लिपि नहीं मिली। मेरे खंडहरों में किसी पाँच-पैर वाले जीव का जीवाश्म तक किसी खोजी ने नहीं पाया। मेरे होने का कोई प्रमाण नहीं है, सिवाय उन शब्दों के, जिन्हें पढ़ने वाला शायद कभी कोई नहीं होगा।
मैं किसी औसत-से गाँव की सबसे पुरानी इमारत का वह आँगन हूँ, जहाँ अब कोई बच्चा खेलने नहीं आता।
पीपल के पेड़ पर अब झूले नहीं डाले जाते। रस्सियाँ गल चुकी हैं। दीवारों का चूना झर चुका है। चौखट पर बैठी धूप भी अब किसी का इंतज़ार नहीं करती।
मेरा इंतज़ार भी अब जर्जर हो चुका है।इतना जर्जर कि अब आदत और इंतज़ार में फ़र्क़ नहीं है।मुझे कोई नहीं पहचानेगा।और फिर, कोई मेरा लिखा हुआ कुछ पढ़ेगा ही क्यों?किसी को क्या लेना-देना उस सभ्यता से, जो ख़ुद अपने खंडहरों में अपना नाम भूल चुकी हो? खण्डहरों से आँसुओं की बू आती है। मेरे शब्द पड़े रहने दो। किसी पुराने आँगन की धूल की तरह।किसी बंद कमरे में रखी उस किताब की तरह।
दिशा 🌻
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