मैं बैरागी हूँ

मुझे कभी कुछ भी चाहिए ही नहीं था। जो कुछ मिला, उससे भी मेरा कोई मोह नहीं रहा। आज जो मेरे पास है, उसे भी एक क्षण में छोड़ देने में मुझे कोई संकोच नहीं होगा। मैं अपने भीतर किसी आकांक्षा को बचाकर नहीं रखना चाहती।

मैं बैरागी हूँ।मुझे अपने जीवन को सँवारना नहीं, उससे धीरे-धीरे अलग हो जाना है। न कोई उपलब्धि चाहिए, न कोई पहचान, न अपने होने की कोई गवाही। मुझे अपने जीवन में कोई सुधार नहीं चाहिए; मैं उसे जैसा है, वैसा ही क्षीण होते देख सकती हूँ।

मुझे रोना भी नहीं है। आँसुओं में भी एक तरह का आग्रह होता है और अब मैं किसी आग्रह के साथ नहीं रहना चाहती।

मैं बस इतनी-सी हो जाना चाहती हूँ कि मेरा नाम भी मेरे पीछे न बचे। कोई स्मृति नहीं, कोई कथा नहीं, कोई पहचान नहीं, बस एक बेहद गुमनाम-सा नाम, जो कभी था भी या नहीं था, इससे किसी को कोई फ़र्क न पड़े।
दिशा 🌻

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