Category: विरह

  • कला का शागिर्द

    क्यों लिखती हो इतना?
    मेरे पास बैठो, बातें करो।
    थोड़ा वक़्त बाटो,झगड़े करो।

    क्या लेखनी ही तुम्हारा दुनिया की रीतियों से पलायन है?
    क्या मेरी बाँहें वो सुकून नहीं दे सकतीं?
    क्या ये टाइपराइटर कि आवाज़ मेरे स्पर्श से ज़्यादा दिलचस्प है?

    मैं थक कर घर किसके लिये आयूं?
    मैं किसके आँचल में मुँह छुपाऊँ?
    सुनो ना, अब चाय में चीनी ज़्यादा करके क्यों नहीं बनाती?

    नाराज़ हो? साड़ी तोहफ़े में लोगी?
    सुनो गज़रे वाले को क्या बोलूँ?
    दिन में दो दफ़ा गजरा बदलने वाली तुम, बाल खोल के ३ दिन से टाइपराइटर के आगे हाथ क्यों घुमा रही हो?

    रोज़ धुली हुई साड़ी का आँचल मैला क्यों रखा है?
    चाय के कप के गोल निशान हर तरफ़,हर तरफ़ क्यों है, रजनी?
    आखों के कोने में आंसू की ये एक धारा,२ दिन से नीचे क्यों नहीं गिरी?

    मुझसे व्यथा का कारण तो बाटों?
    बाहर आये बच्चों के साथ नहीं खेलोगी?
    तुम मेरे बटुए में छुट्टे पैसे नहीं टटोलोगी?

    मुझे तुम्हारी चिंता क्यों है?
    मैं दुनिया की नज़रों में तुम्हारा प्रेमी तो नहीं?
    मैं तुम्हारा हमसफ़र तो नहीं?

    मैं तुम्हारी कला का शागिर्द हूँ।
    मैं तुम्हारी साड़ी के पल्लो का किनारा हूँ।
    तुम सूर्या हो,तुम्हारी रोशिनी में चमकता मैं सितारा हूँ।

    दिशा🌻

  • बेज़ुबान

    मैं इतना असहाय हो चुका हूँ कि अपनी बात को रोटी के साथ खा रहा हूँ। होठों को सूत से सी दिया गया है और ज़बान को काटकर खूँटी पर टाँग दिया गया है। मैं इतना बेबस हूँ कि इंसान भी मेरी हालत पर शर्मिंदा हैं।

    मैं पूरा गल चुका हूँ।मेरी बाती को जला कर गला दिया गया है। मैं, अपनी बातों को सूटकेस में बंद कर, उन्हें अपने साथ लेकर कहीं दूर चला जाना चाहता हूँ। अपनी ज़बान को वहीं खूँटी पर टँगा छोड़कर, एक बेज़ुबान जानवर की तरह मीलों दूर भटकना चाहता हूँ। वहाँ पहुँचकर भी वह सूटकेस कभी नहीं खोलूँगा। कभी नहीं।

    मेरी ज़बान मेरे बिना मछली जैसा छटपटाएगी, उछलेगी, तड़पेगी, बेहोश हो जाएगी, फिर एकाएक एक दिन मर जाएगी। उसके साथ ही मर जाएगा मेरा स्वीकार्यता का जुनून।

    फिर मैं कहीं दूर से भी दूर जाकर बस जाऊँ और फिर कभी नहीं बोल पाऊँ । इशारों में बात करूँ। बेज़ुबान रहूँ। धीरे-धीरे सुनना और देखना भी छोड़ दूँ, दुनिया की आवाज़ें मुझ तक न पहुँचें और ना मेरी ख़ामोशी किसी तक।

    अपनी कायरता को ओढ़कर हर रात तपस्या करूँ। मलिन कपड़े पहनूँ और चुपचाप सो जाऊँ। दुःख को समझने के लिए किसी चोट का मोहताज नहीं होना चाहता; बस इतना चाहता हूँ कि दुःख मेरे भीतर उतरे और वहीं अपना घर बना ले।

    फिर मैं बस अपने दुख के लिए जिऊँ। अपने ख़ुद के लिए रोऊँ और अपने आँसू सींचू। फिर मैं अपने ही आँसुओं के लिए दिन काटूँ।

    बेज़ुबान।

    दिशा 🌻

  • दरवाज़े के बाहर

    मैं तुम्हारे दरवाज़े के सामने खड़ा हूँ। दरवाज़ा खटखटाने की हर नाकाम कोशिश करता हुआ। अपनी दायीं हाथ की बीच वाली उँगली से अगर तीन बार दस्तक दूँ, तो तुम जान जाओगी, मैं हूँ। मगर तुम दरवाज़ा नहीं खोलोगी। तुम्हें मालूम है, दरवाज़े खोलना और मुझे भीतर आने देना, दो अलग-अलग अपराध हैं।

    मैं निरा बेवक़ूफ़, अपनी ज़ुबान पर आते तुम्हारे नाम को थूक के साथ घोंट जाता हूँ। मैं तुम्हारा नाम लेने के लायक़ नहीं हूँ। तुम्हारे नाम की मात्राएँ भी मेरे हलक से निकलने की इजाज़त नहीं रखतीं। कभी-कभी लगता है, नाम लेना भी एक तरह का अधिकार है। और प्रेम में मैंने अधिकार खो दिए हैं, शायद उसी दिन, जिस दिन तुम्हें प्रेम करना शुरू किया था।

    मैं तुम्हारी हरी जूतियों से चिपकी वह मामूली-सी धूल हूँ, जिसे तुम चलते-चलते अपने रास्ते से झाड़ देती हो।
    फिर भी देखो, मेरी औक़ात का आख़िरी हिस्सा भी तुमसे चिपका हुआ है।

    क्या मैं तुम्हारी लिखी कोई कविता पढ़ दूँ? नहीं। मेरी ज़ुबान से निकलते ही वह कविता नहीं रहेगी। वह मेरे होने से मलिन हो जाएगी। मैं कोई ऐसा मुजरा भी नहीं कर सकता जिसकी थरथराती आवाज़ तुम्हारे हिमालय जैसे, खरबूजे की तरह भीतर से लाल और बाहर से चुप दिल को थोड़ा-सा पिघला दे। मैंने तो अपना कितना वक़्त तुम्हारी उस लाल मख़मली चादर के इर्द-गिर्द गुज़ारा है, जैसे कोई ग़रीब आदमी मंदिर के बाहर बैठकर भीतर के भगवान की कल्पना करता है।

    मुझे अपने आस-पास रख लो। मुझे कहीं कोई कोना दे दो।
    कमरे का नहीं, अपनी ज़िंदगी का भी नहीं। मुझे अपनी उस नापसंद मूर्ति की तरह कमरे के किसी कोने में पनाह दे दो, जिसे तुम रोज़ देखती हो और रोज़ नज़रअंदाज़ कर देती हो।

    मैं कविता नहीं कह सकता। मेरी औक़ात नहीं है। कविता तो तुम्हारी आँखें हैं। तुम्हें ज़ुबान देना ऐसा ही है जैसे कोई नदी को बहना सिखाए, या रात को अँधेरा करना। मैं कौन होता हूँ तुम्हें आवाज़ देने वाला?

    मुझे समझ नहीं आता, तुम मुझे छोड़ क्यों नहीं देतीं? क्योंकि शायद छोड़ देना भी प्रेम का एक रूप है, और तुम मुझ पर वह कृपा भी नहीं करना चाहतीं। इसलिए मैं यहीं हूँ। ज़मीन पर। तुम्हारे घर के बाहर। दरवाज़े को निहारता हुआ।
    न दस्तक अब बाकी है, न पुकार। बस एक आदमी है, जो तुम्हारे दरवाज़े के बाहर बैठा है और ये समझ रहा है कि शायद प्रेम की सबसे बड़ी सज़ा यही है कि तुम किसी को अपना भगवान बना दो और वह तुम्हें अपने दरवाज़े के बाहर इंसान भी न रहने दे।
    दिशा 🌻

  • आँचल

    व्यंग पढ़ा तो दुख याद आया,

    हर  मज़ाक़ के पीछे का दर्द 

    हर ठहाके के पीछे का कृदन

    हर टेढ़ी कही गई बात का

    सीधा सा सरल दुख।

    प्रेम पढ़ा तो दुख याद आया

    हर स्पर्श के साथ की  चुभन 

    हर स्मृति के पीछे की लालसा 

    हर  सुध की जीवंत कामना का 

    सीधा सा सरल दुख।

    वीर को पढ़ा तो दुख याद आया

    हर विजय के साथ का त्याग 

    हर त्याग के पीछे की परिकथा 

    हर जीते जागते आघात का

    सीधा सा सरल दुख|

    रौद्र पढ़ा तो दुख याद आया।

    हर भृकुटि की रेखा का दर्द 

    हर आक्रोश के पीछे की बेचैनी 

    हर निर्माता को आँचल में समेटे 

    सीधा सा सरल दुख ।

    दिशा 🌻

  • सौदेबाज़ी!

    दुख महंगा बिकता है,

    हम सस्ते तौले जाते हैं।

    मेरी दुविधा मेहंगी बिकती है,

    उपाय सस्ते तौले जाते हैं।

    अधूरा प्रेम बहूमूल्य बिकता है,

    मुकम्मल इश्क़ सस्ता तौला जाता है।

    आवाज़ मेहंगी बिकती है,

    विचार सस्ते तौले जाते हैं।

    फ़ासले महँगे बिकते हैं,

    नज़दीकियाँ सस्ती तौली जाती हैं।

    रास्ते महँगे बिकते हैं,

    घर सस्ते तौले जाते हैं।

    दिशा🌻