कौन फ़रेबी?

फ़रेबी ले गए सब जान-प्राण,
फ़रेबियों की क्या पहचान?

मुखौटे ओढ़े बाज़ारों में घूमते
फ़रेबी,
ले गए सब सामान,
ले गए सब अरमान।

फ़रेबी जाल बिछाएँगे,
तुम्हें ऐंठेंगे,
तुम्हारी रूह के रेशे-रेशे से
मतलब निचोड़ेंगे।
फिर तुम्हें बिलखता छोड़,
अपने आँसू पोंछेंगे।

फ़रेबी ये, फ़रेबी वो,
बिन एक शब्द बोले
माँगेंगे तुमसे तुम्हारी जान।
सुनायेंगे
प्रेम की पहचान।

फ़रेबी ले गए नींद,
ले गए सुकून,
ले गए आँखों में पलते
तमाम मासूम जुनून।

फ़रेबी ले गए पंछी का घोंसला,
शाख़ पर छोड़ गए
एक उजड़ा आसमान।

फ़रेबी ले गए सब जान-प्राण,
फ़रेबियों की क्या पहचान?

वे तुम्हें लूटेंगे भी,
तुम्हारे लुट जाने पर रोएँगे भी।
तुम्हारी बर्बादी का मातम मनाते हुए
तुम्हारी बर्बादी के किस्से सुनाएँगे भी।

और तुम,
अपनी ही राख में
अपना वजूद तलाशते हुए,
बहुत देर तक सोचते रहोगे
कि आख़िर तुम्हें लूटा किसने था।
कौन फ़रेबी, भाई?
दिशा 🌻

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