मेरी नदी

एक नदी मेरे मन को सीधा काट, मेरे दिल के दो टुकड़े करते हुए अपना रास्ता बना लेती है। मैं चट्टानों की तरह रास्ता रहगुज़र धीरे धीरे, लम्हा लम्हा छोड़ देता हूँ। मुझे लहर और नहर का फ़र्क़ नहीं पता। मैं बस उसका साहस देख कर रास्ता छोड़ देता हूँ। कभी कभी उसकी तेज़ नाक की याद बहुत सताती है। जब वो गिरती थी मेरे ऊपर, अपना सर्वस्व न्योछावर कर। रातों को वो और जमील हो जाती थी। चाँद की रोशनी में उसकी नाक और कटीली बन मेरे हर रेशे में रास्ता ढूँढने लगती थी। मुझे ख़ुद में और उसमे अंतर बहुत कम समझ आता था। मैं उसका समुद्र तो नहीं था। पर वो मुझमें काफ़ी समा चुकी थीं। मैं आज उसकी कोमल कमर पकड़े उसकी आँखों को याद किया करता हूँ। उसको देखे ज़माना होगया। पर वो तो मेरे पास ही है। पर हाँ ज़माना होगया।उसकी हर उस तेज़ धार, उसके हर उस चोट की कमी मुझे कंकड़ कर रही है। जब वो मेरे साथ थी तो मैं चट्टान था। अब वो आगे जा चुकी है, मैं महज़ कंकड़ बन चुका हूँ। उसकी याद में छुपता हुआ, कहीं गिरता, चोटें खाता, ज़ख़्म बढ़ाता, झुकता हुआ, ख़त्म होता हुआ, मैं। मुझे मेरी नदी की गहराई खा रही है। मैं उससे प्रेम नहीं करता, पर उसकी कलकल से मुझमें उत्तेजना है। वो नापाक नदी अपने क्रोध में मुझे पी जाएगी। मैं धूल बन उसमे समा जाऊँगा। वो मेरे हर रोम में रहते हुए और एक साथ ही मुझे छोड़ कहीं दूर पहाड़ों में अपना घर बनायेगी। मैं कंकड़, राहों में पड़ा उसकी कमर पकड़े, सूखा पड़ने का इंतज़ार करूँगा।
दिशा 🌻🌻

Comments

Leave a Reply