
मेरी डायरी में इस वक्त इतनी अधूरी कविताएँ हैं, इतने अधूरे लेख हैं, कि मैं अधूरे लेखों पे लिख रही हूँ । बहुत कमाल के लोग होते हैं जो सब अंत तक पहुँचाने का जोश और एकाग्रता रखते हैं।
मुझ जैसे विचलित लेखक से रोज़ रात बिस्तर में कलम ख़ुद दो दफ़े पूछती है, कभी ख़त्म कर पाओगी? कुछ भी? कोई अधूरी लड़ाई, कोई अधूरा सीखा हुआ नृत्य, कोई पुराना याराना, कल वाली वो बात, ऑफिस के काम, अपना श्रृंगार या ये लेख? कुछ भी?
जवाब में मैं अपने बचे सारे होश हवास समेट कर,आधी रात को,कलम को ठेंगा दिखाते हुए जब उठती हूँ, तो मेरा रिकॉर्ड रहा है, कुछ नया अधूरा पनप ज़रूर जाता है ।आज तक कभी कुछ पूरा नहीं हुआ। कलम को खुश करने के चक्कर में डायरी अलग रूठ बातें बनाना शुरू करदेती है, मेरा कुछ तो लाज कर लो! कितने पन्ने खाली पड़े हैं? अब कुछ क्या लिखने की ज़रूरत नहीं है। पहले ये सब पूरा करो ।
क्या पूरा करदू ? बताओ मुझे कोई? मुझे ख़ुद किसी भी शुरुआत का अंत नहीं पता । मुझे ख़ुद किसी कहानी को कैसे ख़तम करना है, नहीं पता । बिल्कुल नहीं पता । खैर मेरा डायरी कलम के साथ रूठना मनाना तो चलता ही रहता है। और बस इसी उम्मीद में कि कभी तो डायरी कलम ख़ुश होकर मुझे कोई खोया एक गुलाब ईनाम में देंगे लिखने का सतत प्रयास करती हूँ पर बदले में मिलता वोही है, एक और अधूरा लेख।
दिशा।🌻






