कवि और कविता का सानिध्य

मैं क्या हूँ,
क्या बन सकती हूँ
मैं क्या थी,
मैं किसमे परिवर्तित हो जाऊँगी?
मैं कितनी मूर्ख हूँ
कितनी समझदार
नैतिकता से कितने पश्चिम
उकताने के कितने क़रीब
सभ्यता से कोसों दूर
और मानवता के कितने बगल।

तुम्हें अपने गणित
से ही भेदना होगा
कवि और कविता का
सानिध्य।
दिशा 🌻

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