स्वयं संग इंसाफ़

मनुष्यता के इतिहास में
तुम कितने मनुष्य थे?
आग के आविष्कार से
पुच्छल तारे की खोज तक
तुम कितने मनुष्य बचे हो?

और फिर
कितने खून किए तुमने
कितनों को वरदान दिया?

काम किया!
क्या काम किया?

तुमने कितना इंसाफ़ किया?
गुनहगार हो तुम अपने
जो रच दिया सबका भाग्य
अपनी नसों को काट खोला।

खून बहा कर तुमने अपना
आज कौन सा देश आज़ाद किया?

मनुष्यता की खोज में हमने
मनुष्य को ही मार दिया!

भूगोल विज्ञान साहित्य इतिहास
गणित का खोखला विकास किया

पर फिर
क्या अर्थ रहा इस जीवन का
जब सामर्थ्यवान सभ्यता दे ना सकी
इंसाफ़ तुम्हें।
अच्छा,
तुमने स्वयं कब
ख़ुद संग इंसाफ़ किया?

ये मोह ये विरक्ति ये माया
ये सम्पूर्ण रचना का सार,
“अविष्कार और उपलब्धियों” को
क्या “मनुष्यता” का एहसास करा पायी है?

क्या “अविष्कार और उपलब्धियों”
को पता है
कि मनुष्यता की शुरुआत,
“स्वयं संग इंसाफ़”से होती है।
दिशा🌻

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