क्या तुम कभी मुझे इतनी मोहब्बत कर सकते हो?
इतनी मोहब्बत कि ओढ़ लो तुम पूरा ब्रह्मांड,
पूरी सृष्टि की इब्तिदा अपनी पेशानी पर रख लो,
और खड़े रहो हर उस राह-ए-बहर पर
जहाँ मुझे चलने की कोई पाक ख़्वाहिश हो।
समाज की हर उस दुकान के सामने
जहाँ मेरी बोली लग रही हो,
तुम मेरी ख़ामोशी का सबसे ऊँचा दाम लगा दो।
क्या तुम मुझसे इतनी मोहब्बत कर सकते हो
कि अपनी सारी रियाज़त, सारी कैफ़ियत,
सारी गणित को ज़िन्दगी भर गुना करते रहो
और इश्क़ का कोई जवाब ना मिले।
उन्स और फ़ना के बीच की सारी दूरियाँ
चंद साँसों में तय हों।
और जब हमारी आँखें
एक-दूसरे की आँखों में डूबते-डूबते
वक़्त के आख़िरी किनारे तक पहुँच जाएँ,
तो मौत के दरवाज़े पर भी
हम एक-दूसरे को चादरों में नहीं,
अपनी रूह में लपेट रहे हों।
इबादत और इश्क़ में फ़र्क़ कहाँ रहता है?
जब किसी की आँखें
किसी दूसरे के वजूद की आयतें पढ़ने लगें,
जब ख़ामोशी भी दुआ की तरह क़ुबूल होने लगे।
क्या तुम इबादत कर सकते हो?
क्या तुम सजदे में बैठकर मुझे पढ़ सकते हो,
जैसे कोई पुरानी, मुक़द्दस किताब
जिसका मक़सद हर बार पढ़ने पर बदल जाए?
अपनी हर दुआ में मेरी कैफ़ियत की फ़िक्र,
मेरी हर ख़ामोशी का मतलब पूछे बिना समझना।
मेरी आँखों में उतरकर
उन अँधेरी जगहों तक जा सकते हो
जहाँ मैं ख़ुद भी जाने से डरती हूँ?
किसी रोज़ ख़ुद से भी बेगानी जब बैठूँ,
तो क्या तुम मुझे मेरे ही भीतर से
ढूँढ़कर वापस ला सकते हो।
ऐसी मोहब्बत,
एक-दूसरे को पाते-पाते
हम वजूद से आगे निकल जाएँ
जहाँ तुम मेरे महबूब से पहले
मेरे गवाह बनो,
मेरे राज़दार बनो,
मेरी रूह की तिलावत बनो।
दिशा 🌻
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