सामूहिक मृत्यु मुझे उतना नहीं डराती। शायद इसलिए कि उसमें एक अजीब-सा साथ होता है। अंतिम क्षण में भी अकेले न होने का एहसास। बहुत-से मृत चेहरे एक साथ दिखाई दें, तो मृत्यु जैसे व्यक्ति से हटकर एक घटना बन जाती है। चेहरे अलग-अलग होते हुए भी मृत्यु सब पर एक सी उतरती दिखाई देती है।
लेकिन एक अकेले व्यक्ति की मृत्यु समाज को कहीं अधिक बेचैन करती है। उसके बारे में चर्चाएँ होती हैं, भाषण दिए जाते हैं, तर्क और द्वंद्व खड़े होते हैं। उसकी उम्र के हिसाब लगाए जाते हैं, उसके जीवन के अर्थ खोजे जाते हैं, नए-नए पर्चे निकलते हैं और मृत्यु को समझने की कोशिश में हम उसके चारों ओर शब्दों का एक पूरा संसार खड़ा कर देते हैं।
अनेकों कहानियाँ हैं जो मृत्यु के बाद मृत्यु को सम्भालने में घटित होती हैं। मृत्यु से उभरने के लिए हिम क्या कुछ नहीं करते। कहीं मृत्यु का उत्सव मनाते हैं तो कहीं मृत्यु को पूजा जाता है। रोने का ज़िम्मा महिलाओं के कंधों पे दे जब जनाज़ा आदमियों के कंधों से चल श्मशान पहुंचता है तब तक आँसू सूख चुके होते हैं। मृत्यु से बड़ा कोई सत्य नहीं। हम मृत्यु पे कम बात चीत करते हैं, मृत्यु पे हँसते कम हैं। मृत्यु से बचने का हर संभव प्रयास हमे मृत्यु के और क़रीब लाता है। पर सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि,
हम कब मरते है?
शरीर त्यागने के बाद? या हम निर्णायक रूप से तब मारते हैं जब हमे चाहने वाला अंतिम व्यक्ति मारता है?
दिशा 🌻
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