मैं थक जाती हूँ,
तुम्हारी आवाज़ के इंतज़ार में,
नामौजूदगी के सूनेपन से भरे चौबीस घंटे,
ख़ुद को खर्च करते समाप्त करती,
एक दिए की बाती खो गयी है।
जलते बुझते चीखते खोजते
बाजू बंद नोच के फेंक दिया है
त्योरियाँ चढ़ी रखीं है।
तुम्हारे बाज़ुओं के सिरहाने
मेरा सुकून रह गया है।
दिशा 🌻
Category: प्रेम
-
तुम्हारे बाज़ुओं के सिरहाने
-
स्याही
सत्य ये है
कि तुम पढ़ो
इसलिए लिखती हूँ मैं।अनेकों किताबों के बीच
एक छोटी सी कविता मेरी भी पड़ी हो
तुम्हारी लाइब्रेरी में।जब ज़िंदगी से थक के आओ
किताबों के हुजूम में खड़े हो
पढ़ना क्या है समझ ना पाओ।मेरी कविता तुम्हें
मेरी आँखों सी ही पुकारे
तुम दिन भर की थकान पहला शब्द पढ़ के मिटा दो।मेरी काजल पेंसिल सा बुकमार्क हो तुम्हारा
मेरे गजरे की सुगन्ध हर पन्ने से आए
मेरे कानों के कुंदन से बिखरे हो शब्द इधर उधर।तुम पन्ने पलटो,
वो छोटी कविता पढ़ो
जो तुम पहले हस के टाल दिया करते थे।क्युकी
मेरे लिखने का बस एक ही सिद्धांत है
मेरे जीवन का बस एक उद्देश्य
की मैं जो लिखू
तुम पढ़ो।
कोई उसे देखे ना देखे
तुम पढ़ो।
दिशा 🌻 -
बेपरवाह
बहुत अपने से बहुत पराए तुम
नरम थे सख्त थे
तुम रात की वो आवारा हवा थे
बालों पे पड़ती वो अल्हड़ आज़ादी तुम
ख़ाली सड़क पे पीछे भागते वो पेड़ वो लोग
वो व्यस्थ रातों की ख़ाली अधूरी नींद थे
समय के घरौंदों से कोसों दूर
तुम्हारा घर था
तुम्हें वहाँ अकेले रहना पसंद नहीं था
पागल आवारा नादान
चंचल चितवन बेपरवाह
तुम थे।
हर बात पे हँसते थे
हर बात पे यूँ ही कुछ भी
बेहद छोटी सी बात पे रूठ जाते थे
तुम बहुत सुंदर थे
इतने ज़िम्मेदार
उससे थोड़ा सा ही ज़्यादा लापरवाह
तुम्हारी हर अदा के पीछे एक राज था
मेरी कल्पना को जैसे किसी ने
आकाश से बुला धरती पे सजाया था।
दिशा 🌻 -
आँखों से ही सही
महफ़िल में जब भी बात तेरे आँखों की हुई,
मैं चुप रही ।
चुप रही मैं,
तेरी आँखों का ज़िक्र जब जब हुआ।
भूरे रंग को कला बताया गया।
मद्धम होती पुतलियों की गहराई भी
कुछ फीट कम बतायी गई।
पर मैं चुप रही।
चुप रही हर उस बैठक में
जहाँ जहाँ तेरी पलकें कुछ कम गिनायीं गईं।
तेरी नज़रों पे जहाँ किए गए
अनेकों प्रश्न उत्तर।
कमी है, हाँ कुछ तो कमी है,
इन नैन नक्शों के भीतर।
पर मैं चुप रही।पर जब बोला गया कि तू आँखों से नहीं बोलता,
मैं ख़ुद को रोक ना पायी।
मैं बोली, मैंने सुना है।
उनका गुनगुनाना, बेवजह मुस्कुराना।
मैंने सुना है।
उनका रूठना, उनका मनाना।
मैंने सुना है।
उनकी अपील, उनका हट्ठ।
सुना है,
उनका गुस्सा, उनका प्रेम।
मैंने सुना है,
वो सब वो जो दुनिया को नहीं बताती।
मैंने सुना है,
आँखों से ही सही।
पर मैंने सुना है।
दिशा 🌻 -
रूठना मनाना

इमेज क्रेडिट्स तो थे राइटफुल ओनर मेरी डायरी में इस वक्त इतनी अधूरी कविताएँ हैं, इतने अधूरे लेख हैं, कि मैं अधूरे लेखों पे लिख रही हूँ । बहुत कमाल के लोग होते हैं जो सब अंत तक पहुँचाने का जोश और एकाग्रता रखते हैं।
मुझ जैसे विचलित लेखक से रोज़ रात बिस्तर में कलम ख़ुद दो दफ़े पूछती है, कभी ख़त्म कर पाओगी? कुछ भी? कोई अधूरी लड़ाई, कोई अधूरा सीखा हुआ नृत्य, कोई पुराना याराना, कल वाली वो बात, ऑफिस के काम, अपना श्रृंगार या ये लेख? कुछ भी?
जवाब में मैं अपने बचे सारे होश हवास समेट कर,आधी रात को,कलम को ठेंगा दिखाते हुए जब उठती हूँ, तो मेरा रिकॉर्ड रहा है, कुछ नया अधूरा पनप ज़रूर जाता है ।आज तक कभी कुछ पूरा नहीं हुआ। कलम को खुश करने के चक्कर में डायरी अलग रूठ बातें बनाना शुरू करदेती है, मेरा कुछ तो लाज कर लो! कितने पन्ने खाली पड़े हैं? अब कुछ क्या लिखने की ज़रूरत नहीं है। पहले ये सब पूरा करो ।
क्या पूरा करदू ? बताओ मुझे कोई? मुझे ख़ुद किसी भी शुरुआत का अंत नहीं पता । मुझे ख़ुद किसी कहानी को कैसे ख़तम करना है, नहीं पता । बिल्कुल नहीं पता । खैर मेरा डायरी कलम के साथ रूठना मनाना तो चलता ही रहता है। और बस इसी उम्मीद में कि कभी तो डायरी कलम ख़ुश होकर मुझे कोई खोया एक गुलाब ईनाम में देंगे लिखने का सतत प्रयास करती हूँ पर बदले में मिलता वोही है, एक और अधूरा लेख।
दिशा।🌻
-
पहली पहल!

21 बरस की उमर,
वो पीपल का पेड़,
मेरी पीली वाली साड़ी
छोटी सी बिंदी!लाज सरम नीची पलकें
सिकुड़े पाँव, फँसती पाजेब,
कुछ लड़की सी अदाएं
कुछ औरतों सी पाबंदी।२ कप मीठी चाय,
ताकते झांकते परिवार,
माँ के आँखों से,सब पूछ लेना
1-2 सवालों में ही,के इशारे।ठंड में पसीने से भींगा पल्लू,
घबरायी नज़रों से पहली बार
मिलती २ शांत चंचल आँखें
शोर में छाया मदहोश सन्नाटा।मुझे आगे पढ़ना है,
एम ए फिलोसफी से करना है,
बोलने में 1 घंटा लग जाना
और आपका ये सुन मुस्कुराना!
दिशा🤍 -
वो चार सफ़ेद बाल

दुनिया की नापाक हसरत होगी
तुम्हारी वो लट
शायरियाँ लिखी जाती होंगी
तुम्हारे सुरमे पे
लोग रंग शोध करते होंगे
गुलाबी होठों पे
ब्रह्मांड गूँथ समेटा होगा
काली छोटी बिंदी ने
रोज़ थोड़ा बहक़ जाता होगा कोई
उस झुमके की चाल पे पर
पार इन्हें इक शृंगार है सजनी
दिखा छिपा रही हो तुम
शक भरी निगाहों से बचता तुम्हारी
डरा सहमा सा साज वो
पारलौकिक अलौकिक दृश्य अदृश्य
सजनी तुम्हारे हर शृंगार से सुंदर
है तुम्हारे वो चार सफ़ेद बाल।
बाल जो सुनाते हैं
तुम्हारे संगर्ष की दास्तान
जो करते हैं तुम्हारी
नाकामियों को बयान
जो गूँथे बैठे हैं तुम्हारे
गिर के उठने की कहानी
जो पढ़ते हैं
25 की उमर में 35
के तजुर्बे की निशानी
सफ़ेद बाल जो जोड़ते
हैं तुम्हारे कटीले नैन नक़्श
में चार चाँद
ना जाने क्यों छिपा रखा है
उन्हें समझ बेजान।
बीच माँग काढ़े जब
झांकते हैं वो काले बादलों से
बखूबी मेरी नज़रों में
और बड़ी हो जाती हो तुम वैसे।
जीती जागती कविता वो
सुनहरे बेदागी चंचल नादान
लहराओ जैसे लहराती
पहन आसमान।
दिशा🤍
-
हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी!

Picture credits to the rightful owner पगडंडी,पहाड़, बर्फ और झरने
एक छोटा सा घर
70-75 तक की उम्र
मैं और तुम,
छोटी छोटी बातें,
वो तुम्हारी लंबी ठहाके वाली हंसी,
और स्साथ में स्मिता पाटिल की
समोसे संग लाल वाली चटनी
वहीं पुरानी पिक्चर।
कामयाबी,करतब,सोहरत और ब्रह्मांड
एक बड़ा सा बंगला
50-55 तक की उम्र
मैं और तुम
कभी कभार मिलना मिलाना
वो काम के बीच कम ज़्यादा सी बातें
और साथ में बैठ स्मिता पाटिल की
आधी छूटी पिक्चर पूरी करने की ख़वाइश।
दिशा🌻