मैंने अपने सारे श्रृंगार को उतार कर जब तुमको पहना, तो मैंने अपने आप को सबसे स्वतंत्र पाया। मैं उड़ सकती थी और तैर भी सकती थी। मैं ब्रह्मांड से तारे नोच के उन्हें अपने बिस्तर के ऊपर लगा सकती थी। मुझे पूरा मंगल, बुद्ध, शनि दिख रहा था। मैं कहीं मिलती नहीं थी और कभी भी मिल सकती थी। मुझे ख़ुद से मिलने में ज़रा भी वक़्त नहीं लगता था। हाथ और पैर सब इतने लंबे होगये थे कि मैं सीधा बादलों को पकड़ बारिश करवा सकती थी। शरीर इतना हल्का कि बृहस्पति का गुरुत्वाकर्षण बल भी ना जकड़ पाए।मैंने जब तुम्हारी आँखें पहनी थीं, मैं दुनिया की सबसे सुंदर लड़की थी।
दिशा 🌻
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