प्रेम का विलोम

“प्रेम युद्ध से बेहतर है”
यह वाक्य सुनने में जितना प्रेम के पक्ष में लगता है, उतना ही भीतर से प्रेम का अपमान है।

प्रेम और युद्ध को एक ही वाक्य में खड़ा कर देना ही प्रेम की पहली क्षति है। क्योंकि जिस दिन प्रेम की महानता सिद्ध करने के लिए उसके सामने युद्ध को रख दिया जाता है, उसी दिन अनजाने में युद्ध को प्रेम का प्रतिद्वंद्वी, उसका समकक्ष बना दिया जाता है। और यदि प्रेम और युद्ध का नाम कभी साथ न लिया जाए, तो शायद युद्ध की तथाकथित महानता में कुछ कमी आ जाए।

मनुष्य ने युद्ध के पराक्रम को समझाने के लिए सदियों से प्रेम का सहारा लिया है। बड़े-बड़े योद्धाओं के साहस, समर्पण और जुनून को प्रेम के रूपकों में बाँधा गया। धीरे-धीरे हमारी भाषा ने हमें यह विश्वास दिला दिया कि प्रेम और युद्ध एक-दूसरे के विलोम हैं, मानो एक में कोमलता हो तो दूसरे में शक्ति, एक में समर्पण हो तो दूसरे में विजय।

लेकिन सच शायद इससे कहीं अधिक असुविधाजनक है।

प्रेम और युद्ध कभी एक-दूसरे के विलोम थे ही नहीं।

असंख्य युद्ध प्रेम के नाम पर लड़े गए हैं और अनगिनत प्रेम-कथाएँ युद्धों की राख में समाप्त हुई हैं। इतिहास में प्रेम ने युद्ध को जन्म दिया है और युद्ध ने प्रेम को छीन लिया है। कभी प्रेम युद्ध का कारण बना, कभी युद्ध प्रेम की नियति। मगर इससे दोनों एक-दूसरे के विपरीत नहीं हो जाते।

क्योंकि युद्ध प्रेम की अनुपस्थिति हो सकता है,
पर प्रेम का विलोम युद्ध नहीं है।

प्रेम का विलोम केवल और केवल अप्रेम है।

जहाँ प्रेम नहीं है, वहाँ उदासीनता हो सकती है, घृणा हो सकती है, हिंसा हो सकती है, युद्ध हो सकता है, लेकिन इनमें से कोई भी प्रेम का वास्तविक विलोम नहीं।

प्रेम किसी युद्ध का शांतिपूर्ण संस्करण नहीं है,
न युद्ध प्रेम का उग्र रूप।

प्रेम को युद्ध के बरक्स रखकर उसकी श्रेष्ठता सिद्ध करने की आवश्यकता ही क्यों हो? प्रेम को किसी युद्ध पर विजय पाने की आवश्यकता नहीं। उसे किसी शत्रु की आवश्यकता नहीं। वह स्वयं में पूर्ण है।

शायद इसलिए प्रेम को युद्ध से बेहतर कहना भी प्रेम के साथ न्याय नहीं।

क्योंकि प्रेम को बेहतर होने के लिए
युद्ध से तुलना करने की आवश्यकता नहीं।

उसे बस प्रेम होना है।
दिशा 🌻

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