तुम्हारे बाज़ुओं के सिरहाने

मैं थक जाती हूँ,
तुम्हारी आवाज़ के इंतज़ार में,
नामौजूदगी के सूनेपन से भरे चौबीस घंटे,
ख़ुद को खर्च करते समाप्त करती,
एक दिए की बाती खो गयी है।
जलते बुझते चीखते खोजते
बाजू बंद नोच के फेंक दिया है
त्योरियाँ चढ़ी रखीं है।
तुम्हारे बाज़ुओं के सिरहाने
मेरा सुकून रह गया है।
दिशा 🌻

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