सत्य ये है
कि तुम पढ़ो
इसलिए लिखती हूँ मैं।
अनेकों किताबों के बीच
एक छोटी सी कविता मेरी भी पड़ी हो
तुम्हारी लाइब्रेरी में।
जब ज़िंदगी से थक के आओ
किताबों के हुजूम में खड़े हो
पढ़ना क्या है समझ ना पाओ।
मेरी कविता तुम्हें
मेरी आँखों सी ही पुकारे
तुम दिन भर की थकान पहला शब्द पढ़ के मिटा दो।
मेरी काजल पेंसिल सा बुकमार्क हो तुम्हारा
मेरे गजरे की सुगन्ध हर पन्ने से आए
मेरे कानों के कुंदन से बिखरे हो शब्द इधर उधर।
तुम पन्ने पलटो,
वो छोटी कविता पढ़ो
जो तुम पहले हस के टाल दिया करते थे।
क्युकी
मेरे लिखने का बस एक ही सिद्धांत है
मेरे जीवन का बस एक उद्देश्य
की मैं जो लिखू
तुम पढ़ो।
कोई उसे देखे ना देखे
तुम पढ़ो।
दिशा 🌻
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