अधूरापन

कुछ भी पूरा करना इतना कठिन क्यों है?
सब कुछ आधा लिखा छूटा हुआ है,
कभी कभी तो उन आधी लिखी चीज़ों से
दो दिन बाद कुछ नई ही कहानी जन्म ले लेती है।

शायद मैं थक जाती हूँ।
थक जाती हूँ,
कहानी पूरी करते करते।
थक जाती हूँ,
एक ही किरदार निभाते निभाते।

शायद मुझे हर किरदार से चाहिए,
थोड़ा आराम थोड़ी दूरी थोड़ा अलगाव।

शायद मुझे हर अंत से पहले,
कुछ अधूरा छोड़ देना अच्छा लगता है,
ताकि वापसी की कोई वजह बनी रहे।

मैं हर किरदार को पूरा जीना चाहती हूँ,
पर हर बार वो मुझसे कुछ चुरा लेते हैं,
नींद, शांति, या कभी-कभी मैं खुद।

कुछ पलों को थामे रखने की कोशिश में,
मैं छूटते लम्हों की आदत बना बैठी हूँ।

शायद अधूरापन ही मेरी मुकम्मल पहचान है,
हर अधूरी कहानी में मैं थोड़ी और पूरी हो जाती हूँ।

दिशा 🤍

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