तुम किसके हो?
अपने भी हो?
पाबंदियाँ लगा के,
परिंदे भी उड़ते है क्या कहीं?
जहाँ गिरोगे वो अखाड़ा है,
मुसाफ़िर को घर मिलते है क्या कहीं?
वर्चस्व के खेल में शहीद-ए-अरमां,
रुई सी मखमल तुम्हारी आत्मा।
खोया पाया सब यहीं बस यहीं,
दोमुहा चेहरा,आईना और घड़ी।
इबादत में झुकता तुम्हारा सर,
कब जाने को मिलेगा यहाँ घर?
आज दिन बनाने में लगे हो,
पारस अमृत सा ख़ज़ाना।
छोटी छोटी ग़लतियों में,
बसता था दिन आशियाना।
आखें मिलाओ ग़ैर से,
बताओ नज़र आती है ख़ुदी?
घर ढूँढ रहे और रास्ता,
भटके पिछले मोड़ पर ही।
ढूँढो ढूँढो यहीं होगा कहीं,
वो तारा वो मोती वो रात गमगीन।
प्रेम में साफ़ दिखाई नहीं देता,
आदमी में आम सुनाई नहीं देता।
आँखों के मोती और आसमान के तारे,
बिखरे रास्ते में साथी तुम्हारे।
जीवन का चक्र और ये सौर्य मंडल,
एक ही तो हैं और कितने पृथक।
गली में देखो छज्जे से झांको,
रास्ता निकालो ग़लत सही,
होगा घर यहीं कहीं।
दिशा 🌻
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