Category: धुँधली खिड़की

  • कलम पीछे छूट गयी

    कलम पीछे छूट गयी

    Photo: Tarun Chouhan

    मैं आगे दूर पहाड़ों से शहर आ गयी।

    यहाँ सुबह उठ सब बाट जोहते हैं
    मेरी शहर में शाम नहीं होती।
    दिन गिरती समुद्र की लहर समान
    रात से सुबह और आँखें खुली की खुली।

    इस जगह सब मुझे जानते है मैं किसी को नहीं।
    यहाँ वक़्त हमेशा कम है,
    और मैं हर पल व्याकुल ।

    सृजनात्मकता का अल्हड़पन गुम है,
    मुस्कान, हाव भाव, चाल ढाल आँखें पाबंद
    अनुपात में घुलना मिलना है सबसे,
    दृश्य अदृश्य और बातें उससे भी कम

    दिशा🌻

  • अप्रैल

    अप्रैल

    Photo: Tarun Chouhan

    अप्रैल एक ऐसा महीना होता है जो कब आता है और कब निकल जाता है, हम खुद ढूँढते रह जाते हैं। ये उन महीनों में है जो कैलेंडर में नहीं, यादों में गिना जाता है। अप्रैल हमेशा सुंदर महीनों में गिना जाता है। बसंत ऋतु आ रहा होता है, पेड़ों पर नई पत्तियाँ धीरे-धीरे खुल रही होती हैं, हवा में एक नर्मी होती है जो बिना छुए भी छू जाती है, और कुछ पुराना बहुत चुपचाप पीछे छूट रहा होता है।

    विलियम शेक्सपियर ने कहा है,
    “April hath put a spirit of youth in everything.”

    मेरा जन्मदिन भी अप्रैल में ही पड़ता है। पहले जन्मदिन का मतलब होता था रात के बारह बजे का इंतज़ार, फोन की घंटियाँ, और केक काटते वक़्त की वो छोटी-सी खुशी जो पूरे साल याद रहती थी। अब जन्मदिन थोड़ा अलग होता है। उत्सुकता की जगह शायद “शांत स्वीकृति” ने ले ली है, या फिर एक ऐसी खामोशी ने, जिसमें हम खुद को थोड़ा ज़्यादा साफ़ सुन पाते हैं। अब ये दिन जश्न से ज़्यादा एक आईना बन गया है जहाँ मैं खुद को देखती हूँ और बिना ज़्यादा सवाल पूछे बस हल्का सा मुस्कुरा देती हूँ।

    पर अच्छा है। अच्छे दोस्त हैं, अच्छे लोग हैं। कुछ सच्चे, कुछ ज़रूरी सब ठीक है। मैं ये बात बार-बार खुद से कहती हूँ, जैसे कोई मंत्र हो, जिसे दोहराते रहने से दिल भटकता नहीं है। काम का बोझ है, लोगों का शोर है कभी-कभी इतना कि अपने ही ख़यालों की आवाज़ दब जाती है। पर उन्हीं के बीच मैं थोड़ी-सी किताबें पकड़कर आगे बढ़ रही हूँ, जैसे भीड़ भरी सड़क पर कोई चुपचाप अपना रास्ता बना लेता है। शब्दों के सहारे खुद तक पहुँचने की ये कोशिश ही शायद अब सबसे सच्ची लगती है।

  • जनवरी

    जनवरी

    Photo: Tarun Chouhan

    जनवरी जैसे आई थी, उससे ज़्यादा तेज़ी से निकल गई। अभी कल ही तो मैं बड़े गंभीर मूड में नए साल का रेज़ोल्यूशन ले रही थी, खुद को बदलने का, ज़िंदगी को ट्रैक पर लाने का, और शायद ब्रह्मांड को भी थोड़ा समझ लेने का। और आज पता चला कि नए साल का पहला महीना ख़त्म हो गया है, बिना किसी औपचारिक सूचना के।

    जनवरी दरअसल बहुत चालाक महीना है। आते वक़्त हमें पूरा भरोसा दिलाती है कि “अभी तो साल पड़ा है”, और जाते वक़्त एहसास कराती है कि समय को भरोसे में लेना सबसे बड़ी गलती है। हम सोचते रहे कि अभी बहुत वक्त है, कल से शुरू करेंगे, परसों गंभीर होंगे, अगले हफ्ते जीवन सुधारेंगे। और इसी बीच जनवरी ने अपना काम कर दिया।

    सबसे मज़ेदार बात ये है कि हम महीने के ख़त्म होने पर चौंकते हैं, जैसे समय ने कोई नियम तोड़ दिया हो। जबकि नियम तो यही है कि समय हमेशा चलता है, हम ही कभी-कभी रुक जाते हैं। कैलेंडर आगे बढ़ता रहता है और हम वहीं खड़े होकर सोचते हैं कि “अभी तो शुरुआत ही हुई थी।”

    जनवरी जाते-जाते बस हल्के व्यंग्य में पूछती है
    “इतने प्लान थे, उनमें से तुम खुद कहाँ थे?”

    और फिर फरवरी को भेज देती है, एक और मौका बनाकर… जिसे हम शायद फिर अगले महीने समझेंगे।

  • मेरी नीली पतंग!

    मेरी नीली पतंग!

    पतंग हमेशा से भाती थी। बचपन में पापा के ऑफिस से आ जाने से पहले, मतलब तक़रीबन पाँच से छह बजे के बीच, अगल बगल के कई बच्चे अपनी अपनी छत पे एक सफेद रेशमी डोर पकड़े लाल पीली हरे रंगों की पतंग आकाश में लहरा रहे होते थे। उन पतंगों पे अलग अलग तरह की सुंदर तस्वीरें बनी थीं। कहीं पे कोई आने वाली नई पिक्चर की झलक, कहीं पे मेरा सबसे पसंदीदा कार्टून टॉम एंड जेरी, कहीं पे कोई शेरों शायरियां तो कहीं पे चुटकुले। क्या सुंदर दृश्य हुआ करता है। आज भी हुबहू याद है। और उन सबमे सबसे सुंदर वो नीली पतंग! हवा के वेज से लहराती, ना गिरती ना कटती, अपनी छोर पे गोटे टांगे, पूरी आसमान के रंग की, आसमान की ही तरह, आसमान की परी जैसी वो नीली पतंग! मैं दसों पतंगों में बस उसी को निहारती रहती थी। रोज़ अपनी दिनचर्या के हिसाब से शाम पाँच से छह बजे तक आसमान की सैर करती। सभी पतंगें उसे काटने को आतुर रहतीं, मजाल है वो किसी के हाथ आए। लंबे पेड़ उसे बस हवा देते, उसका बिगाड़ तो कोई कुछ नहीं पता था।
    इक शाम की कहानी है। मैं छत पे खड़ी अपने बाल संवार रही थी पर मेरी नज़रें आसमान में उड़ती उन सभी पतंगों में बस अपनी नीली पतंग को निहारने में गुम थीं। मुझे वो हवा में डोलती, उसके वेग में मचलती बहुत मनमोहक लग रही थी। उस दिन मौसम थोड़ा विपरीत था। हवा तेज़ थी जो आंधी का रूप ले चुकी थी। आसमान का श्रृंगार ख़राब हो रहा था, सारी पतंगें इधर उधर लड़ कर या गिर रही थीं या कहीं फँस कर अपना अंतिम संस्कार कर रही थीं।
    मैं भी नीचे जाने की तैयारी में थी। बाल बाँधे, चप्पल पहनी, कान से इयरफोन्स निकाले और पीछे मुड़ी। पीछे शेड के बगल में कोई झाँक रहा था। मैंने ध्यान से देखा तो वो वही नीली पतंग थी। मेरी नीली पतंग।
    दौड़ के मैंने उसको अपनी गोद में उठा लिया। गले से लगा लिया।मैंने उसको जी भर के निहारा। उस आँधी में मैं छत पे खड़ी एक पतंग को ऐसे निहार रही थी जैसे कोई प्रेम पत्र हो।
    अब मेरे पास दो विकल्प थे। मैं आराम से उसे लेकर नीचे ले जा अपने ड्राइंग रूम में सजा उसे दिन रात बैठ निहार सकती थी।या छोड़ सकती थी उसको। जाने दे सकती थी उसको उसके आसमान के पास।
    मैंने दो पल सोचा। इतना काफ़ी था। मैं निर्णय कर चुकी थी। मैं ज़ोर से भागी और अपनी पूरी ताक़त से अपनी सबसे पसंदीदा नीली पतंग को आसमान की तरफ़ उछाल दिया। उसका माँझा कसा। वो उड़ने लगी, वो आंधी में अपने तूफ़ान से उड़ने लगी। मेरी नीली पतंग, अपने आसमान का श्रृंगार करते मुझे देख मुस्कुरा रही थी।

  • मैं, मई और मेरी छुट्टियाँ:)

    मैं, मई और मेरी छुट्टियाँ:)

    Photo: Tarun Chouhan

    कभी मई का नाम सुनते ही दिमाग में आमरस, कुल्फी और “क्या आज टीवी पर कुछ अच्छा आएगा?” जैसे विचार आते थे। अब वही मई आते ही मोबाइल पर आदेश, मीटिंग की नोटिफिकेशन और बढ़ी हुई ज़िम्मेदारियाँ आती हैं। मई मेरे लिए अब छुट्टियों का मौसम नहीं, “ऑल-इन-वन सुपरवाइजर मोड” का सीज़न है।

    मई अब भी वही है—तपता हुआ, चिढ़चिढ़ा, पर यादों से भरा। फर्क बस इतना है कि तब मेरी माँ कहती थीं—“जाओ, बाहर खेल लो”, और अब मैं कहती हूँ—“फुटपाथ साफ़ रखो, लोग बाहर खेलेंगे।”

    लेकिन फिर भी, बीच-बीच में कुछ छोटे पल ऐसे मिल जाते हैं—किसी बच्चे की मुस्कान, किसी बुज़ुर्ग की शाबाशी, या बस एक आम का पेड़ जिसकी छांव में कुछ देर बैठकर पुराने दिन याद कर लूं।
    तभी समझ आता है—ज़िम्मेदारी थकाती जरूर है, पर खाली नहीं रहने देती।

    कभी-कभी लगता है, SDM असल में वो इंसान है जो हर सीज़न को अपने हिसाब से झेलना जानता है—
    सर्दी में कोहरे से पहले पहुंचता है, बारिश में खुद भीगता है और गर्मी में दूसरों को छांव देता है।

    तो हाँ, मई अब भी आता है—हर साल, तपते सूरज के साथ।
    फर्क बस इतना है—अब छुट्टियों की प्लानिंग नहीं करती, उनकी मॉनिटरिंग करती हूँ।

    कभी हम छुट्टियाँ मनाते थे, अब हम छुट्टियों को संचालित करते हैं और इस बदलाव में भी एक अनोखी खुशी है।
    कभी सोचती हूँ, छुट्टियाँ क्या होती हैं?
    शायद जब मन हल्का हो, चेहरे पर मुस्कान हो और काम ‘ड्यूटी’ न लगे—तो वही छुट्टी है।
    तो हाँ, काम करते हुए भी अगर दिल बचपन की तरह हँस सके, तो छुट्टी वहीं शुरू होती है।

    सप्रेम
    दिशा 🌻

  • तिथ्या, चंपक और वो छोटी सी याद

    तिथ्या, चंपक और वो छोटी सी याद

    Photo: Tarun Chouhan

    कभी-कभी ज़िंदगी की आपाधापी में, बड़े-बड़े लक्ष्यों और भारी-भरकम ज़िम्मेदारियों के पीछे भागते हुए हम उन छोटी-छोटी खुशियों को भूल जाते हैं, जो हमारे वजूद की सबसे कोमल परतों को छूती हैं। आज का दिन भी कुछ ऐसा ही था — स्थल निरीक्षण पर एक जटिल समस्या के समाधान हेतु मैं मौके पर पहुँची थी। सिविल सेवाओं की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि दिनभर अनेक प्रकार की चुनौतियाँ सामने आती रहती हैं।

    काम पूरे जोश में था। फ़ील्ड में हलचल थी, अधिकारी थे, स्थानीय लोग थे, शिकायतें थीं, समाधान की तलाश थी। सब कुछ अपने ढर्रे पर चल रहा था। मैं भी पूरी तरह से काम में डूबी थी, जब अचानक एक नन्ही सी लड़की मेरी तरफ़ दौड़ती हुई आई — हाथ में एक नीली कलम, आँखों में जिज्ञासा और चेहरे पर मासूम मुस्कान।

    “मैं तिथ्या हूँ!” उसने कहा।

    वो मोम सी कोमल थी, और उसकी बातें काजू कतली सी मीठी। वो मुझे अपने किसी गंभीर सपने के बारे में बता रही थी कुछ अजीब, कुछ दिलचस्प। उसकी चंचलता में वो मासूम जादू था, जो व्यस्ततम दिन में भी ठहराव ले आता है।

    मैं बैठ गई। उसने पहाड़े सुनाए, गिनती दोहराई, और मेरी गोद को अपना सिंहासन मान बैठी।उसकी मुस्कान ने जैसे दिन भर की थकान धो दी।
    थोड़ी देर बाद, चिंटू और महिमा भी आ गए।दोनों ही अपने अंदाज़ में बेहद चुलबुले, मगर बातों में समझदारी की झलक साफ़ थी। उनकी बातों में मुझे अपने बचपन की वो शामें याद आ गईं, जब “चंपक”, “नंदन”, और “बालहंस” मेरी दुनिया हुआ करते थे।

    हमने हँसी-मज़ाक किया, कुछ सवाल-जवाब हुए, और फिर सबने मिलकर असल समस्या को समझा और सुलझाया। जैसे इन बच्चों ने भी अपना योगदान दिया हो।

    वो कुछ मिनट, वो हँसी, वो पहाड़े और वो मासूम सपने — मुझे एक बार फिर याद दिला गए कि मैं सिविल सेवा में क्यों आई थी।

    कागज़ी काम, प्रशासनिक आदेश, फ़ील्ड निरीक्षण — ये सब महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इन सबसे बढ़कर है लोगों से मिलना, उनकी ज़िंदगी को समझना, उन्हें सुनना। मैं हमेशा से यह चाहती थी — लोगों से संवाद, उनकी समस्याओं का समाधान, और हर किसी को यह महसूस कराना कि वे देखे और सुने जा रहे हैं।

    तिथ्या, चिंटू और महिमा — आज के दिन के सबसे अहम पात्र थे। उन्होंने मुझे ये नहीं बताया कि एक पुल कैसे बनता है या कोई नाली कैसे साफ़ होती है, लेकिन उन्होंने वो याद दिला दिया जो वक़्त के साथ कभी-कभी धुंधला होने लगता है — इंसानियत, जुड़ाव और सच्चे सेवा भाव की अहमियत।

    शायद हर अफसर को कभी न कभी ऐसे लम्हों की ज़रूरत होती है — जो उसे उसके ‘क्यों’ की याद दिला सके।

    दिशा 🌻

  • अफ़सर बिटिया!

    अफ़सर बिटिया!

    Photo: Tarun Chouhan

    बधाई हो सिया।
    इतनी बड़ी अफ़सर बन गई
    माँ बाप तो बड़े होंगे खुश
    अरे घर पर भेजती भी हो पैसा कुछ
    कितना बाज़ार जाती हो
    ८-९० झोले तो तुम रोज़ ही लाती हो
    मेकअप तो तुम्हारा पूरा चहचहाहट है
    काम के बीच मिलती तुमको बड़ी फुर्सत है!
    अच्छा बड़ों का पैर अब भी छू पति हो
    या सबपे अपनी अफ़सरी ही चलती हो
    अच्छा सुनो महीने का ऊपर नीचे से सब कितना कमाती हो
    लड़की हो नौकरी में छूट तो होगी ही
    सुंदरता का फ़ायदा मिल जाता होगा यूँ ही
    रात में १२-१ बजे पार्टी पे रोक नहीं है
    भले घर की लड़की के ऐसे तो शौक़ नहीं है
    देखो बेटा बन गई बड़ी मेहनताने
    हम ना करेंगे ट्रिम के शक
    लेकिन बेटा यही नहीं है ज़िंदगी का असली मक़सद
    लड़की अफ़सर तो ज़्यादा परेशानी है
    नौकरी तो बड़ी पर घर की अलग ही कहानी है
    भई लड़की जो भी बने जहां भी पहुँचे
    होती तो वो है माँ बाप पे ज़िम्मेदारी
    कौन सा कलेक्टर बन गई तो शादी मुफ़्त में होगी तुम्हारी?
    अच्छा तुम्हें कोर्ट मैरिज है करनी
    शर्म नहीं आयी ऐसी बेफ़िज़ूल बातें क्यों करनी
    क्या अभी और है पढ़ना
    बेटा दिमाग़ ठीक है थोड़ा सोच के बातें करन
    ३० के पहले शादी करना है घोर घोर ज़रूरी
    बच्चे परिवार में दिक़्क़त होगी नहीं बेफ़ीज़ुली
    पति बच्चे ही अब होने चाहिए तुम्हारे सपने
    सबसे करीबी हम ही तो है तुम्हारे अपने
    फेमिनिज्म के गाने जीतने भी गा लो
    दफ़्तर में अफ़सरी कितनी भी चला लो
    घर में बेटा बड़ों को तुमने ही है बना खिलाना
    अरे तुम हो सुपरवुमन नौकरी घर सब उँगलियों पे सँभालना।
    बेटा बेटी होती है प्यार दिल और समर्पण देने के लिए
    घर का सारा झिग्झिग अपने अंदर समा लेने के लिए
    इतने मेहनत से तुम्हें पढ़ाया लिखाया अफ़सर बनाया
    अब जल्दी से शादी और बच्चे कर के भर दो किराया।

    दिशा🌻

  • मैं ख़ुद एक किताब

    मैं ख़ुद एक किताब

    किताबों की भीड़ में मैं एक किताब खोज रही थी। उसे खोजते खोजते न जाने कितनी किताबें पढ़ डालीं। आज भी सबकी खुश्बू याद है मुझे। हर किताब की अपनी अलग गंध थी। कहीं पन्नों के बीच दबा कमल था, कहीं सूख चुका गुलाब, जिसकी पंखुड़ियाँ अब भी किसी पुराने प्रेम पत्र की तरह शब्दों से लिपटी हुई थीं। मैंने उन फूलों के डंठल तक संभालकर रखे थे, जैसे वे किसी बीत चुकी ऋतु की हड्डियाँ हों।धीरे धीरे मुझे एहसास हुआ कि शायद मैं किताबों को नहीं पढ़ रही थी। शायद किताबें मुझे पढ़ रही थीं। मैं तो बस एक दर्शक थी, अपने भीतर खुलते हुए अध्यायों को देखती हुई। कहीं टॉल्सटॉय युद्ध और शांति के बीच मनुष्य की असहायता का अर्थ समझा रहे थे, कहीं ययाति अपनी अतृप्त इच्छाओं का बोझ उठाए मुझे उन युगों में ले जा रहा था जहाँ नियति और लालसा एक दूसरे का गला घोंटती रहती हैं। कहीं कोई देवता मेरे पुण्यों का हिसाब लगा रहा था, तो कहीं कोई दैत्य मेरे गुनाहों को एक एक कर गिनकर मुझे बता रहा था कि दोनों के बीच की दूरी उतनी नहीं होती जितनी कथाएँ हमें यक़ीन दिलाती हैं।

    मैं पढ़ी जा रही थी। परत दर परत। शब्द दर शब्द। जैसे कोई प्राचीन ग्रंथ मेरी आत्मा के हाशियों पर झुककर नोट्स लिख रहा हो।फिर एक दिन वह किताब मिली, जिसके किसी साधारण से पन्ने पर तुम्हारा ज़िक्र था।

    अजीब बात है, उससे पहले तक मैंने अनगिनत किताबें पढ़ी थीं, पर शायद पहली बार किसी किताब को पढ़ा था। मैं उसके भीतर उतरती चली गई। उसके रेशे रेशे को, उसकी स्याही की नमी को, उसके शब्दों की धड़कन को। पहली बार लगा कि किताबें केवल विचारों का घर नहीं होतीं, वे कभी कभी किसी मनुष्य का पुनर्जन्म भी होती हैं।शायद पहली बार मुझे किताबों से प्रेम हुआ। या शायद पहली बार किताबों ने मुझसे प्रेम किया।

    उसके बाद मैं तुम्हें पढ़ती गई। पढ़ती गई। और जितना पढ़ती गई, उतना ही अपने भीतर नई कहानियाँ बुनती गई। उन कहानियों में युद्ध थे, जिनमें सेनाएँ नहीं, स्मृतियाँ लड़ती थीं। प्रेम था, जो गुड़हल के फूलों के रस की तरह उतरता था। सृजन था, सृष्टि थी, ब्रह्मांड था, तारों की अनगिनत मृत रोशनियाँ थीं, और उनके बीच भटकती हुई मैं थी।
    पढ़ते पढ़ते मैं ख़ुद एक किताब बन गई थी। एक ऐसी किताब, जिसके कुछ पन्नों पर अब भी तुम्हारा नाम लिखा है, और बाकी पन्नों पर तुम्हारी अनुपस्थिति।
    दिशा 🌻

  • दुख को प्रेमपत्र

    दुख को प्रेमपत्र

    मैं मिलों मील चल रही हूँ। तुमसे दूर जाने के हर्षक प्रयास में रोज़ विफल हूँ। तुम्हारा होना मेरे संघर्षों की रगों में चुभता रहता है। तुम मेरे सबसे घनिष्ठ मित्र और मेरी हर अधूरी बातों का मुकम्मल जवाब हो।इस पल मेरे जीवन के हर मूलभूत भाव के जनक, तुम। मेरे हर उस भाववाचक संज्ञा को जन्म देते तुम, जो मैंने कक्षा छह में पढ़ी थी और बाक़ी बचें हर उस भाव, भावना जो मैंने किसी भी कक्षा में नहीं पढ़ी। मुझे कभी सिखाई नहीं गई। तुमसे उत्पन्न कितनी ही भावनाओं को संज्ञानित कर सकती हूँ मैं? शायद हज़ारों।
    पर मुझे तुमसे दूर जाना है। मिलों दूर। कुछ हज़ार नौ सौ किलोमीटर।मैं कभी मान नहीं सकती कि मैं तुमसे दूर जाना नहीं चाहती। तुम अनपेक्षित हो, अप्रत्याशित हो, अकल्पित हो।

    अच्छ! मुझे किसी भी कक्षा में नहीं पढ़ाया गया कि दुख के विशालकाय पेड़ की शाखाओं पे हरी पत्तियाँ भी है पीली भी हैं और कुछ भूरी हैं। दुख का पेड़ मरुस्थल में अकेले खड़ा सभी को राह दिखाता हुआ अपनी जड़ें, जंतु के जन्म से जोड़े खड़ा है।
    मैं मोहग्रस्त तुम्हारी ही शाखाओं पे बैठ तुमसे ही दूर कहीं दूर निकलने की तलाश में हूँ। इस बात से पूर्णतः अनजान कि मैं जिससे दूर भाग रही हूँ उसी पर सवार हूँ, उसी की पत्तियों को चबा रही हूँ, उसी का रस घोंट रही हूँ और तुम कबका मेरी चेतना के मूल तत्व बन चुके हो। अब तुम्हारे बिना जीवन बेरंग, बेरस, बेबस है।
    तुमसे विशालकाय कुछ नहीं। तुम से सर्वोपरि और कुछ नहीं। तुमको जस का तस अपनाना ही एकमात्र उपाय नज़र आता है। इसी उपाय से सुख की उत्पत्ति होती है। तुमसे ही प्रेम है, भोग है, विलास है, विच्छाद है, अपनापन है, उम्मीद है, उत्साह है, करुणा है, पछतावा है, विरक्ति है, तड़प है, विद्रोह है, विस्मय है। मेरी आत्मा में जन्म लेने वाली हर भावना का स्रोत तुम ही तो हो। तुम हो तो मैं ये महसूस कर पा रही हूँ की मैं भी कहीं ना कहीं हूँ।
    तुमसे दूर जाने की कोशिश समंदर के विरुद्ध चलती उस कश्ती जैसी है, जिसे आख़िरकार तुम्हारी ही शाखाएँ किनारे का पता बताती हैं। मैं तुमसे दूर होकर भी तुम्हीं तक लौट आने के लिए बनी हूँ।
    दिशा🌻

  • मृगतृष्णा

    मृगतृष्णा

    आज कल से बेहतर था। आज उसकी याद सुबह उठने के बाद थोड़ी कम आई। शायद कुछ ३ प्रतिशत कम। शायद। मैं धीरे धीरे उसे भुलाने के प्रयास में, उसकी स्मृतियाँ चेतन से अवचेतन मस्तिष्क में ढकेल रही हूँ। मैं अपने प्रयासों में सार्थक हो रही हूँ, ये मुझे चोट कर रहा है। इन्ही प्रयासों में एक दिन ऐसा आजायेगा कि वो मुझे दिन भर नहीं याद आयेगा, दिन भर वो मेरे मन मस्तिष्क में टहलता नहीं रहेगा। अब वो बस स्मृतियों में पनपेगा। कभी कमल बन तो कभी कछुए की तरह। कभी कभी स्मृतियाँ जीवन बन सामने आ खड़ी हो जायेंगी। कभी किसी कीड़े मकोड़े, कभी कोई अट्रैंडम छिपकली, कभी सूरजमुखी, कभी रौशनदान और कभी कोई कविता की पुरानी किताब। अब वो इन सभी मज़बूत लम्हों में ज़िंदा रहेगा।
    वो ज़िंदा होगा ही अपनी ज़िंदगी में। साँस लेता, उठता- बैठता, मज़ाक़ करता, ठहाके लगता। कभी देर से उठता, कभी जल्दी उठ फिर सो जाता। तयार होता, टाई लगाता, फूल ख़रीदता, किताबें पढ़ता। घर परिवार से बात चीत करता। नए दोस्त बनाता।
    उसे मेरे होने ना होने से तिनके मात्र भी फ़रक नहीं पड़ेगा। मैं उसकी चेतना से कहीं दूर अपनी कब्र बिछा चुकी होऊँगी। उसकी ज़िंदगी में उत्सव आयेंगे, जलसे होंगे, शोक विषाद दौड़ेगा, वो सब झेल लेगा। मैं कहीं दबती चली जाऊँगी। स्टेशन पे पड़ी पुरानी किताब की दुकान में सबसे पुरानी किताब के नीचे। थोड़ी फटी, थोड़ी कुचली।
    उसी स्टेशन की उस रोज़ आती जाती गाड़ियों में से एक 'मैं' होंगी। जो रोज़ अपने सामर्थ्य से दोगुने यात्रियों को उठा, उन्हें जैसे तैसे अपने गंतव्य पर पहुचाती है। ज़िंदगी की पटरियों पे दौड़ती साँसों को अब नए आयामों से संजो यात्री अपनी ट्रेन की वाहवाही करेंगे। नए नए मंज़र गुज़रेंगे। कभी पहाड़, कभी झरने, कभी नदी कभी पीपल का पेड़ कभी रेगिस्तान। मैं सबसे गुज़रती जाऊँगी। अपने जीवन के हर मरुस्थल को पार कर मैं अपनी मृगतृष्णा से मिलूँगी। वहाँ रुकूँगी और दो पल रुक कर फिर आगे बढ़ जाऊँगी। मृगतृष्णा से अवबोध मुझे मेरे सपनों की याद दिलाएगा। अवचेतन मस्तिष्क मुझे फिर से प्रेम की समुद्री झील में धकेल कल्पना की कुटिया बना पुकारेगा। मैं अपनी चेतना को संभाल, उसके प्रताप को लपेट, यादों के कंकड़ को झील में फेंकते हुए, फिर सदर पे आगे बढ़ जाऊँगी। सिर्फ़ इसी आस में कि वो भी कहीं सफ़र में ही होगा!
    दिशा 🌻