Category: धुँधली खिड़की

  • दुःख का वृक्ष

    दुःख की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उससे किसी की मृत्यु नहीं होती। मनुष्य दुःख से मरता नहीं, बस धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। अपने ही भीतर सिकुड़ता हुआ, अपने अस्तित्व के किसी कोने में सिमटता हुआ। हम चींटियों जैसे छोटे जीव, हाथियों जितना भारी अपना दुःख माथे पर उठाए शहर-शहर भटकते रहते हैं। कोई नहीं देख पाता कि हमारी देह से कहीं अधिक थक चुका है हमारा भीतर।

    धीरे-धीरे हम धरती में धँसने लगते हैं। अपने ही होने के बोझ तले, अपनी ही पीड़ा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से खिंचते हुए। हमारी व्यथाओं की जड़ें भीतर की मिट्टी में फैलती जाती हैं। हम उन्हें अपने आँसुओं से सींचते हैं, अपनी ख़ामोशियों से खाद देते हैं और अपनी अनकही बातों की धूप में बड़ा करते हैं। फिर एक दिन, अनजाने ही, हमारा दुःख एक वृक्ष बन जाता है। इतना विशाल कि उसकी छाया में हमारा शेष जीवन ढक जाता है।

    उस वृक्ष पर अवसाद और विरक्ति के फल लगते हैं। हम उन्हें तोड़ते नहीं, बस अपने ही हाथों से उगाए होने के अपराधबोध में उन्हें देखते रहते हैं। कभी-कभी उनमें से एक फल भीतर गिरता है और हम कई दिनों तक यह तय नहीं कर पाते कि जो टूटने की आवाज़ हमने सुनी थी, वह किसी फल के गिरने की थी या हमारे भीतर बचे हुए किसी आख़िरी हिस्से की।

    शायद दुःख का अंत होना ज़रूरी नहीं होता। शायद वह केवल अपना आकार बदलता है। पहले एक घटना होता है, फिर एक स्मृति, फिर एक स्वभाव और अंततः हमारे व्यक्तित्व का वह हिस्सा, जिसे हम अपने मूल स्वभाव की तरह स्वीकार कर लेते हैं। हम भूल जाते हैं कि कभी हम इसके बिना भी थे।

    और इस तरह दुःख हमें मारता नहीं है। वह हमसे हमारा थोड़ा-थोड़ा अस्तित्व माँगता है, जब तक कि एक दिन हम जीवित तो रहते हैं, लेकिन अपने ही जीवन में पहले जितनी जगह नहीं घेरते।

    दिशा 🌻

  • याद-ए-सलेमपुर

    याद-ए-सलेमपुर

    Photo: Tarun Chouhan

    मुझे कभी कुछ नहीं चाहिए था। रात के सबसे शांत पहर में बैठकर सोचती हूँ, तो सच यही लगता है कि मुझे कभी कुछ भी नहीं चाहिए था। अपना थोड़ा बिखरा हुआ, थोड़ा खोया हुआ स्वरूप ही मुझे प्रिय था।

    काम हमेशा मुझे संभालता रहा है। अच्छे लोगों के साथ, अच्छे लोगों के लिए काम करना, शायद यही सलेमपुर था। केवल एक तैनाती नहीं, बल्कि जीवन का एक ऐसा अध्याय, जहाँ मैंने स्वयं को सबसे अधिक जाना।

    जीवन के सबसे बड़े पड़ाव, सबसे कठिन चुनौतियाँ और सबसे गहरी सीख मुझे यहीं मिलीं। इतने जटिल प्रकरण, इतने उलझे हुए धागे, कि कभी-कभी लगता था जैसे कलम कागज़ पर नहीं, नक्शों और नियतियों पर चल रही हो। अपनी ज़िंदगी के दो सबसे महत्वपूर्ण वर्ष मैंने इन्हीं उलझनों को सुलझाते हुए बिताए, और धीरे-धीरे यह सफ़र एक दायित्व से बढ़कर मेरा अपना हिस्सा बन गया।

    मुझे यहाँ इतना स्नेह मिला, इतना सम्मान मिला, कि आज भी लगता है कि मैं शायद इसके योग्य नहीं थी। शायद सच ही है, जब मन कुछ नहीं माँगता, तब सितारे औक़ात से कहीं अधिक दे देते हैं।

    मैं अपनी इस कर्मभूमि का ऋण शायद कभी नहीं चुका पाऊँगी। कुछ स्थान केवल जगहें नहीं होते, वे हमारे भीतर बस जाते हैं, हमारी दृष्टि, हमारे निर्णय और हमारी आत्मा का हिस्सा बनकर।

    मैं सलेमपुर को हमेशा अपने भीतर एक उजली स्मृति की तरह संजोए रखूँगी। कुछ चेहरों, कुछ मुस्कानों, कुछ अधूरी बातों और अनगिनत सीखों के साथ।

    और फिर, इस विश्वास के साथ विदा लेती हूँ—

    सितारों को आँखों में महफ़ूज़ रखना,
    बड़ी दूर तक रात होगी।
    मुसाफ़िर हैं हम भी,
    मुसाफ़िर हो तुम भी,
    किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।

    — आपकी दिशा 🌻

  • जुलाई

    जुलाई

    Photo: Tarun Chouhan

    लिखने को कितना कुछ है।हर दिन मेरे आसपास कोई न कोई कहानी जन्म लेती है। कोई रिश्ता टूटता है, कोई उम्मीद बनती है, कोई सपना अपनी ही राख में बैठा अगली सुबह का इंतज़ार करता है। और मैं, अपनी ही नाकामियों में मुग्ध, उन्हें हार नहीं, बुलंदियों की सीढ़ियाँ समझकर जोड़ती चली जाती हूँ।ज़िन्दगी कभी रुककर नहीं घटती। वह तो परिस्थितियों के बहाने रोज़ अपना चेहरा बदलती रहती है। एक बैग, कुछ किताबें, कुछ कपड़े, और फिर सब बदल जाता है। नई जगह, नए लोग, नई फ़ाइलें, नए दस्तावेज़, नई ज़िम्मेदारियाँ। जैसे किसी ने पिछला अध्याय बिना विदा कहे बंद कर दिया हो।ठहराव हमें कभी दिया नहीं जाता; उसे धरती खोदकर निकालना पड़ता है। और अक्सर जब तक वह मिलता है, हम फिर किसी और सफ़र के लिए देर कर चुके होते हैं।
    आगे बढ़ना ही मनुष्य का सबसे बड़ा अभिशाप भी है और सबसे बड़ी मुक्ति भी।
    इश्क़ में आगे बढ़ना पड़ता है।
    काम में भी।
    नाकामियों में भी।
    धूप में, बरसात में।
    शायद जुलाई इसी का नाम है। आगे पढ़ने का, आगे बढ़ने का। जैसे किताब का कोई ऐसा अध्याय जिसे पढ़ना मन नहीं करता, फिर भी पलट देना पड़ता है, क्योंकि कहानी किसी एक पन्ने पर हमेशा के लिए नहीं ठहरती।
    मुझे चलना अच्छे से आता है। मैं वक़्त की चादर ओढ़ लेती हूँ और उसकी सुइयों से पड़ी सलवटों को चुपचाप समेटती चल देती हूँ। पीछे छूट जाती हैं कुछ रातें, इतनी ख़ामोश कि उनमें अपनी ही साँसें परायी लगने लगें। कुछ चेहरे, जो अब नाम से ज़्यादा एहसास रह गए हैं।
    फिर भी वक़्त बड़ा निर्दयी चित्रकार है। वह सबसे गहरे रंगों को भी धीरे-धीरे धुँधला कर देता है। यादें अंततः स्मृति नहीं रह जातीं, केवल आदत बन जाती हैं।
    आख़िर कितनी देर कोई एक ही चक्र में रह सकता है?नदियाँ भी अपने ही पानी में दोबारा नहीं लौटतीं।
    शायद जीवन का अर्थ किसी को हमेशा के लिए पा लेना नहीं, बल्कि जब तक वह साथ हो, उसे पूरे वर्तमान के साथ जी लेना है। क्योंकि अंत में हमारे पास लोग,जगहें, वक़्त नहीं बचते उनके साथ जिए हुए क्षण बचते हैं। वही दोपहरें, वही लंबी बातचीतें, वही साथ की ख़ामोशियाँ, जिनमें शब्दों की कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। वक़्त सबको अपने साथ ले जाता है, पर वर्तमान में पूरी तरह जिया गया एक पल, स्मृति में नहीं, हमारे स्वभाव में बस जाता है। शायद इसी तरह कुछ लोग चले जाने के बाद भी कहीं नहीं जाते। वे हमारे भीतर रहने लगते हैं। हमारी नज़र में, हमारी भाषा में, हमारी ख़ामोशियों में। अंततः जीवन में स्थायी यदि कुछ है, तो वह साथ नहीं, साथ होने का अनुभव है।

    दिशा 🌻

  • मोक्ष

    मोक्ष

    Photo: Tarun Chouhan

    कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरी ज़िंदगी एक अजीब-सी यात्रा रही है,जहाँ मैंने हर उस चीज़ को पाने के लिए संघर्ष किया, जिसे लोग “उपलब्धि” कहते हैं। बचपन की उम्मीदों से लेकर बड़ी परीक्षाओं तक, सेवा में आने की लड़ाई से लेकर उस पद की ज़िम्मेदारियों तक। सबकुछ पाने की मेहनत की । लेकिन जितना मैंने पाया, उतना ही भीतर कुछ हल्का सा खालीपन भी जागता गया, जैसे मन धीरे से पूछ रहा हो, “क्या यही था वह शिखर, जिसकी इतनी भूख थी?”

    और उसी खालीपन में मुझे एक गहरा सच समझ आने लगा कि पाने की आकांक्षा मुझे जितना खींचकर ऊपर ले जाती है, छोड़ने की इच्छा मुझे उतना ही भीतर ले जाती है। उपलब्धियों की भीड़ में खड़े होकर मैं अक्सर महसूस करती हूँ कि जो कुछ मैंने हासिल किया, वह ज़रूरी था, लेकिन अंतिम नहीं। वह मेरे सफ़र का हिस्सा था, मेरी पहचान का नहीं। कभी-कभी लगता है कि सबसे बड़ी आज़ादी यही है कि मैंने सबकुछ पाकर किसी चीज़ में क़ैद ना हूँ।

    मेरे भीतर यह भावना दिन-ब-दिन स्पष्ट होती जा रही है कि मोक्ष कोई पहाड़ी आश्रम में बैठा शब्द नहीं है; वह मेरे अपने भीतर का एक धीमा, स्थिर अहसास है। वह क्षण है जब मैं समझती हूँ कि अगर आज चाहूँ, तो सबकुछ छोड़ सकने की ताकत मेरे भीतर है। यह ताकत ही शायद मेरा वास्तविक सम्पूर्ण होना है।

    शायद मोक्ष मेरे लिए यह जान लेना है कि पाने की दौड़ में हार भी नहीं थी, जीत भी नहीं थी सिर्फ अनुभव थे। और अब, अनुभवों से भरे हाथों के साथ, उन्हें छोड़ने की इच्छा ही मेरी सबसे सच्ची स्वतंत्रता है।

  • रूठी कलम

    रूठी कलम

    Photo: Tarun Chouhan

    बहुत दिनों बाद कलम उठायी है। वो इसलिए नहीं कि लिखने का ज़रा सा भी इतेफ़ाक़ आया है मुझे। बल्कि इसीलिए की छूट रही है। छोड़ रही है लेखनी। लेखनी मुझे या मैं लेखनी को! पता नहीं।ये वाक्य लिखने में कितनी हिम्मत लगी, नहीं बता सकती। पर लगी। अब ये लिख के भी कलम मुझे पकड़ लेगी या रूठी ही रहेगी? नहीं पता। वो एहसास का एक आख़िरी नज़राना होता है ना। की गलती मान लेने पे महबूब थोड़ा कम नाराज़ होता है! कलम नाराज़ है ना! सिर्फ़ पूरा करने कि दौड़ में, कुछ भी, इधर उधर, कहीं से कुछ भी! जो पकड़ा दिया गया किसी के द्वारा, किसी के लिए। मसला ये है कि सिर्फ पूरा करने के लिए जीना कितना मुकम्मल है? नहीं पता। शायद अब चीज़ें पूरा करने की होड़ में, चीज़ें ख़ुद हो रही है। चीज़ें निगल रही हैं या मैं चीज़ों को घोंट रही हूँ। पता नहीं।अब बस सब कुछ पूरा करना है। सबकुछ बस ख़त्म करना है।असली मुद्दा ये है कि मैं उस लम्हे में क्या थी? मैंने क्या जिया? मैं किस बात पर रोई? कब हँसी? किस किस को जाकर अपनी झूठी सच्ची कहानी गायी? मैं ख़ुद से पूछ ही नहीं रही हूँ! मैं कितनी आगे आ गई हूँ और क्या क्या छोड़ चुकी हूँ, मैं क्यों नहीं पूछ रही? पता नहीं।हाँ माना की कुछ भी कभी पूरा करने वाली सीधी साधी फ़ितरत तो थी नहीं! पर शुरुआत तो थी।क्या यही ज़िंदगी है? मैं ऐसी तो ना थी! वाक़ये में खुदी के लिए वक़्त कितना मंहगा है! चार ग़ज़लें और दो मुकम्मल ख्याल लगते हैं। ये कैसी फ़ितरत है? जहाँ सब पाने की होड़ में, कुछ नहीं है। कुछ है, कुछ नहीं है।मैं हूँ, ग़ज़लें हैं, ख़याल शायद नहीं है। ख़्याल हैं, हम नहीं हैं। हाँ ये ज़्यादा ठीक है। मियाँ कुछ तो नाज़ुक मिजाज़ हैं हम भी। हम भी कलम से रूठ सकते हैं।क्यों? पर हमारी नाराज़गी का कोई पैमाना नहीं। शायद वो कलम के आगे मायने नहीं रखती। अच्छा चलो मान लिया। कलम मुझसे रूठी है। माना मुझसे ही रूठी है वो। मैंने वक्त नहीं दिया। मैंने उसको उठाया और स्याही नहीं भरी। चलो माना। पर प्यार भी तो मैंने ही ज़्यादा किया। उसका क्या? नहीं कौन समझायेगा उसको जाकर? क्या क्या करना है! क्या क्या करना था। पर सब हो तो रहा है। क्या इल्म है? सब हो तो रहा है। यही रफ़्तार है। यही ज़िंदगी की रफ़्तार है। इसमें कलम को कौन समझाये की ज़िंदगी और कलम के बीच कई बार मैंने ज़िंदगी चुनी है। पर मेरी मोहब्बत बेबुनियाद नहीं है।

    दिशा🌻

  • अधूरे लेख

    अधूरे लेख

    Photo: Tarun Chouhan

    मेरी डायरी में इस वक्त इतनी अधूरी कविताएँ हैं, इतने अधूरे लेख हैं, कि मैं अधूरे लेखों पे लिख रही हूँ । बहुत कमाल के लोग होते हैं जो सब अंत तक पहुँचाने का जोश और एकाग्रता रखते हैं। मुझ जैसे विचलित लेखक से रोज़ रात बिस्तर में कलम ख़ुद दो दफ़े पूछती है, कभी ख़त्म कर पाओगी? कुछ भी? कोई अधूरी लड़ाई, कोई अधूरा सीखा हुआ नृत्य, कोई पुराना याराना, कल वाली वो बात, ऑफिस के काम, अपना श्रृंगार या ये लेख? कुछ भी? जवाब में मैं अपने बचे सारे होश हवास समेट कर,आधी रात को,कलम को ठेंगा दिखाते हुए जब उठती हूँ, तो मेरा रिकॉर्ड रहा है, कुछ नया अधूरा पनप ज़रूर जाता है ।आज तक कभी कुछ पूरा नहीं हुआ। कलम को खुश करने के चक्कर में डायरी अलग रूठ बातें बनाना शुरू करदेती है, मेरा कुछ तो लाज कर लो! कितने पन्ने खाली पड़े हैं? अब कुछ नया लिखने की ज़रूरत नहीं है। पहले ये सब पूरा करो ।

    क्या पूरा करदूँ? बताओ मुझे कोई? मुझे ख़ुद किसी भी शुरुआत का अंत नहीं पता । मुझे ख़ुद किसी कहानी को कैसे ख़तम करना है, नहीं पता । बिल्कुल नहीं पता । बस इसी उम्मीद में कि कभी तो डायरी कलम ख़ुश होकर मुझे कोई खोया एक गुलाब ईनाम में देंगे लिखने का सतत प्रयास करती हूँ पर बदले में मिलता वोही है, एक और अधूरा लेख।

    दिशा।🌻

  • सौगात-ए-जून

    सौगात-ए-जून

    Photo: Tarun Chouhan

    जून से मुझे इतने गिले-शिकवे क्यों हैं, यह आज तक समझ नहीं पाई। शायद मैं जून से ख़फ़ा थी, शायद जून मुझसे। या शायद दोनों ही अपने अपने अहंकार में मौसम बने बैठे थे। इल्म किसी को नहीं।

    लेकिन एक बात तय है, जून ने मुझे सबसे ज़्यादा गढ़ा है। उसने मेरी हँसी को उसकी पूरी गुंजाइश दी, और मेरे आँसुओं को भी पूरा मंच। उसने मुझे लोगों की मौजूदगी का स्वाद भी चखाया और अनुपस्थिति की कड़वाहट भी। साथ की दरख़्वास्त करना सिखाया, और सहजता की भीख माँगना भी। फिर उन्हीं बिखरे पलों को सूरजमुखियों का गुलदस्ता बनाकर, बड़ी शराफ़त से, घुटनों के बल बैठकर मेरी हथेली में रख दिया, मानो कह रहा हो, “देखो, टूटने का भी एक सौंदर्य होता है।”

    जून ने मुझे होश में लाने वाली वे तीखी-मीठी गोलियाँ भी खिलाईं जिनका कोई मेडिकल नाम नहीं होता। कुछ लोग उन्हें अनुभव कहते हैं, कुछ मोहभंग, और कुछ, ज़िंदगी।

    साल का यह मध्य अजीब होता है। न शुरुआत का उत्साह बचा होता है, न अंत की परिपक्वता आई होती है। बस इंसान कैलेंडर के बीचों-बीच खड़ा होता है, बिल्कुल अपनी उम्र की तरह, इतना बड़ा कि मासूमियत पर यक़ीन न रहे, और इतना बूढ़ा भी नहीं कि उम्मीद से इस्तीफ़ा दे दे।

    मुझे जून से कोई शिकायत नहीं।

    या शायद शिकायतों का इतना बड़ा पहाड़ है कि अब उसकी ऊँचाई दिखाई देना बंद हो गई है।

    एक वक़्त था जब जून मेरा सबसे प्रिय महीना हुआ करता था। स्कूल की घंटियों से आज़ादी, नानी के घर का बुलावा, आमों की ख़ुशबू, दोपहरों की बेहयाई और शामों की बेफ़िक्री, जून तब छुट्टियों का दूसरा नाम था। तब कैलेंडर सिर्फ़ तारीख़ें नहीं पलटता था, बचपन भी खिल उठता था।

    अब जून आता है तो छुट्टियाँ नहीं, हिसाब लाता है। कितना अजीब है कि बड़े होने का मतलब अक्सर अपनी ही रूह का क्लर्क बन जाना होता है. हर भावना की फ़ाइल बनाओ, हर ख़ुशी का दस्तावेज़ माँगो, और हर आँसू की रसीद संभालकर रखो।

    ख़ैर…

    छोड़ आए हम वो गलियाँ, जहाँ जून सिर्फ़ एक महीना था। अब जून यथार्थ है, मेरा आईना है। मेरी गलतियों की डायरी है, मेरी खुशियों की डिबिया है, मेरा सार्थकता से परिचय है और ये महीना मुझमें मुझ से थोड़ा ज़्यादा है।

    दिशा 🌻

  • रुख़सत-ए-मई

    रुख़सत-ए-मई

    Photo: Tarun Chouhan

    “मई आई और चली गई।
    कहाँ गई? किसी को ख़बर नहीं।
    न कोई चिट्ठी, न कोई संदेश। अपनी सेहत तक का हाल नहीं बताया। बस आई, कुछ दिन मेरे साथ बैठी, मुझसे मेरा हाल पूछती रही और उसी बहाने अपना हाल भी सुना गई। फिर कंधे उचकाकर बोली, ‘चलता है। जीवन है, सब चलता है।’

    जाते-जाते एक और बात कह गई,
    ‘बहुत बड़ी हो गई हो तुम। अब सब झेल लोगी।’

    मैं सोचती रह गई कि किस रात बड़ी हो गई मैं?
    कौन सी सुबह थी जब बचपना चुपचाप अपना बिस्तर समेटकर चला गया?
    कब शिकायतें जिम्मेदारियों में बदल गईं और आँसू तर्कों में?

    पता नहीं।

    पर दुनिया को पूरा विश्वास है कि अब मैं समझदार हूँ।
    बड़े-बड़े संकटों से लड़ सकती हूँ।
    समस्याओं को मुस्कुराकर निगल सकती हूँ।
    मैं एक मज़बूत, सहनशील, समाज की आधारभूत इकाई हूँ। एक चलता-फिरता साम्राज्य, जिसके कंधों पर अपेक्षाओं की पूरी सभ्यता टिकी हुई है।

    और मज़ेदार बात यह है कि इस साम्राज्य के भीतर आज भी एक बच्ची रहती है, जो कभी-कभी खिड़की से बाहर देखकर सोचती है
    ‘मई तो चली गई…
    पर मेरा थोड़ा-सा हिस्सा भी अपने साथ ले गई क्या?’

    अच्छा! मई में मैं रोई भी, हँसी भी।
    कुछ बातें दिल पर लगीं, कुछ को दिल से उतार दिया।
    खाया, पिया, और जीवन की तरह बहुत कुछ पचा भी लिया।
    कुछ इच्छाएँ पूरी हुईं, कुछ अधूरी रह गईं।
    कुछ लोगों ने साथ दिया, कुछ स्मृतियों में बदल गए।

    और आज, इस महीने को अपने भीतर सावधानी से समेटकर,
    अपने पाप और पुण्य का घड़ा उठाए,
    मैं आगे बढ़ रही हूँ।

    यह कोई विजयगाथा नहीं है, न ही पराजय का वृत्तांत।
    यह केवल समय के साथ चलने की एक साधारण-सी प्रक्रिया है।
    जो यह सिद्ध करती है कि परिस्थितियाँ चाहे अनुकूल हों या प्रतिकूल,
    मनुष्य में आगे बढ़ते रहने की एक अद्भुत क्षमता होती है।

    हर दिन कोई नया उत्तर नहीं देता,
    हर संघर्ष कोई बड़ी सीख नहीं छोड़ता,
    फिर भी जीवन अपनी गति से बहता रहता है।

    जो बीत गया, वह अनुभव बनकर मेरे साथ रहेगा।
    जो शेष है, वह संभावना बनकर सामने खड़ा है।
    और मैं अपने समस्त दोषों, गुणों, भ्रमों, विश्वासों, पापों और पुण्यों सहित अगले अध्याय की ओर बढ़ रही हूँ।

    न किसी विशेष गर्व के साथ,
    न किसी विशेष पश्चाताप के साथ,
    बस एक शांत स्वीकृति के साथ कि
    यात्रा अभी जारी है।”

  • क्या मैं वही हूँ?

    क्या मैं वही हूँ?

    Photo: Tarun Chouhan

    आज रविवार को दिनचर्या धीमी थी। काम तो हमेशा की तरह थे, पर मैं ख़ुद धीमी थी। और आप ये न समझें कि इससे मुझे ज़रा भी चिंता हुई हो नहीं, मैं तो ख़ुश थी। हफ़्ते में एक दिन तो मिल ही जाता है, बस ठहरकर तर्ज़ से चलते लोगों को निहारने का, पुरानी आदतों और शौक़ों की धूल झाड़कर उन्हें फिर से सँवारने का। हाँ, ये अलग बात है कि मैंने इनमें से कुछ भी नहीं किया। फिर भी, मन संतोष से भरा रहा। क्योंकि जो भी है,धीमा है, और यही धीमापन अपने आप में सुंदर है।

    सुबह उठते आँख आधी ही खुली थी कि माँ के ढेरों मैसेज एक साथ बज उठे। खोला तो देखा, कुछ पुरानी यादों की तस्वीरें थीं, तस्वीरों की तस्वीरे। जैसे वक़्त को किसी ने पलटकर हाथ में रख दिया हो। मैं काफ़ी देर तक उन्हें देखती रही। फिर आईने में ख़ुद को देखा और भीतर एक प्रश्न गूंजा!

    क्या मैं वही हूँ, जो कभी अपने भाषणों में, वाद-विवादों में, माइक पकड़कर पूरे आत्मविश्वास से कहती थी?क्या आज का मेरा अस्तित्व उस कल की आकांक्षा से मेल खाता है?क्या मैं एक प्रतिशत भी वो बन पाई हूँ, जो कभी बनना चाहती थी? क्या मैंने सच में मंच के इस पार से उस पार तक का सफ़र तय कर लिया है? क्या मैं सच में कुछ कभी थी? कुछ कभी बन पायी? कुछ कभी बन पाऊँगी?

    शायद नहीं! शायद हाँ! शायद!

    पर जब ख़ुद को दस–पंद्रह साल आगे से देखा, तो मन में जो एहसास उठा उसे किस भाववाचक संज्ञा में बाँध दूँ, ये मुझे समझ ही नहीं आया। वो एहसास कभी आशंका-सा लगा, कभी संतोष-सा, कभी पछतावा, कभी आशा।लगने लगा जैसे कल की ही तो बात हो कार्मेल स्कूल का वही स्टेज, स्टेज पर चढ़ने से पहले काँपते हाथ, थरथराते पैर, भूलता हुआ स्क्रिप्ट,
    चेहरों की भीड़ और उनमें छुपा हुआ मेरा डर।

    धुँधला भविष्य उस वक़्त कितना भय, कितना संकोच, और साथ ही कितनी आकांक्षा से भरा हुआ था। अपनी इस डगमगाती-सी दुनिया में सब कुछ अनिश्चित था। हर कदम, हर उम्मीद, हर सपना।

    पर एक चीज़ थी जो अटल रही, वो था मेरा आत्मविश्वास। ना जाने किस पर था, किससे था, पर था।तो मैं आगे कितनी आई, नहीं पता। क्या वो बन पाई, जो कभी बनना चाहती थी, नहीं पता। पर इस पूरी यात्रा के बीच, मैंने ख़ुद से सवाल करना कभी बंद नहीं किया। हर रोज़ आईने में झाँककर पूछ लेती हूँ
    “क्या मैं आज भी वही हूँ,
    या फिर कुछ और बन चुकी हूँ?”

    शायद यही मेरा हासिल है,
    शायद यही मेरी सबसे बड़ी कामयाबी
    और यही सवाल पूछने की हिम्मत ही
    मेरा अपना क्षितिज!

    दिशा 🌸

  • बारिश

    बारिश

    पहले बारिश का मतलब था स्कूल की छुट्टी, छत पर कागज़ की नावें, खिड़की के शीशों पर बहती बूंदें और रसोई से आती गरम चाय-पकौड़ों की ख़ुशबू। तब बादल गरजते थे, तो दिल हँसता था। भीगना कोई मजबूरी नहीं, एक खेल था। मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू में बचपन की मस्ती घुली होती थी।

    अब वही बारिश आती है, तो मीटिंग का समय टलता नहीं, बस Wi-Fi डगमगाता है। दफ़्तर नहीं रुकता, बस सड़कों पर जाम लगता है। अब फ़र्ज़ की छतरी ओढ़ कर चलते हैं।भीगना अब दिल को नहीं, फ़ोन को भारी पड़ता है। तब माँ पुकारती थी ‘भीग मत जाना’, अब सिस्टम कहता है, ‘डेडलाइन मत भूलना’।

    वही मौसम है, वही बादल, वही बूँदें।
    पर अब हम बदल गए हैं। या शायद नहीं!🦋