तिथ्या, चंपक और वो छोटी सी याद

कभी-कभी ज़िंदगी की आपाधापी में, बड़े-बड़े लक्ष्यों और भारी-भरकम ज़िम्मेदारियों के पीछे भागते हुए हम उन छोटी-छोटी खुशियों को भूल जाते हैं, जो हमारे वजूद की सबसे कोमल परतों को छूती हैं। आज का दिन भी कुछ ऐसा ही था — स्थल निरीक्षण पर एक जटिल समस्या के समाधान हेतु मैं मौके पर पहुँची थी। सिविल सेवाओं की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि दिनभर अनेक प्रकार की चुनौतियाँ सामने आती रहती हैं।

काम पूरे जोश में था। फ़ील्ड में हलचल थी, अधिकारी थे, स्थानीय लोग थे, शिकायतें थीं, समाधान की तलाश थी। सब कुछ अपने ढर्रे पर चल रहा था। मैं भी पूरी तरह से काम में डूबी थी, जब अचानक एक नन्ही सी लड़की मेरी तरफ़ दौड़ती हुई आई — हाथ में एक नीली कलम, आँखों में जिज्ञासा और चेहरे पर मासूम मुस्कान।

“मैं तिथ्या हूँ!” उसने कहा।

वो मोम सी कोमल थी, और उसकी बातें काजू कतली सी मीठी। वो मुझे अपने किसी गंभीर सपने के बारे में बता रही थी कुछ अजीब, कुछ दिलचस्प। उसकी चंचलता में वो मासूम जादू था, जो व्यस्ततम दिन में भी ठहराव ले आता है।

मैं बैठ गई। उसने पहाड़े सुनाए, गिनती दोहराई, और मेरी गोद को अपना सिंहासन मान बैठी।उसकी मुस्कान ने जैसे दिन भर की थकान धो दी।
थोड़ी देर बाद, चिंटू और महिमा भी आ गए।दोनों ही अपने अंदाज़ में बेहद चुलबुले, मगर बातों में समझदारी की झलक साफ़ थी। उनकी बातों में मुझे अपने बचपन की वो शामें याद आ गईं, जब “चंपक”, “नंदन”, और “बालहंस” मेरी दुनिया हुआ करते थे।

हमने हँसी-मज़ाक किया, कुछ सवाल-जवाब हुए, और फिर सबने मिलकर असल समस्या को समझा और सुलझाया। जैसे इन बच्चों ने भी अपना योगदान दिया हो।

वो कुछ मिनट, वो हँसी, वो पहाड़े और वो मासूम सपने — मुझे एक बार फिर याद दिला गए कि मैं सिविल सेवा में क्यों आई थी।

कागज़ी काम, प्रशासनिक आदेश, फ़ील्ड निरीक्षण — ये सब महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इन सबसे बढ़कर है लोगों से मिलना, उनकी ज़िंदगी को समझना, उन्हें सुनना। मैं हमेशा से यह चाहती थी — लोगों से संवाद, उनकी समस्याओं का समाधान, और हर किसी को यह महसूस कराना कि वे देखे और सुने जा रहे हैं।

तिथ्या, चिंटू और महिमा — आज के दिन के सबसे अहम पात्र थे। उन्होंने मुझे ये नहीं बताया कि एक पुल कैसे बनता है या कोई नाली कैसे साफ़ होती है, लेकिन उन्होंने वो याद दिला दिया जो वक़्त के साथ कभी-कभी धुंधला होने लगता है — इंसानियत, जुड़ाव और सच्चे सेवा भाव की अहमियत।

शायद हर अफसर को कभी न कभी ऐसे लम्हों की ज़रूरत होती है — जो उसे उसके ‘क्यों’ की याद दिला सके।

दिशा 🌻

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