कलम पीछे छूट गयी

मैं आगे दूर पहाड़ों से शहर आ गयी।

यहाँ सुबह उठ सब बाट जोहते हैं
मेरी शहर में शाम नहीं होती।
दिन गिरती समुद्र की लहर समान
रात से सुबह और आँखें खुली की खुली।

इस जगह सब मुझे जानते है मैं किसी को नहीं।
यहाँ वक़्त हमेशा कम है,
और मैं हर पल व्याकुल ।

सृजनात्मकता का अल्हड़पन गुम है,
मुस्कान, हाव भाव, चाल ढाल आँखें पाबंद
अनुपात में घुलना मिलना है सबसे,
दृश्य अदृश्य और बातें उससे भी कम

दिशा🌻

Comments

Leave a Reply