किताबों की भीड़ में मैं एक किताब खोज रही थी। उसे खोजते खोजते न जाने कितनी किताबें पढ़ डालीं। आज भी सबकी खुश्बू याद है मुझे। हर किताब की अपनी अलग गंध थी। कहीं पन्नों के बीच दबा कमल था, कहीं सूख चुका गुलाब, जिसकी पंखुड़ियाँ अब भी किसी पुराने प्रेम पत्र की तरह शब्दों से लिपटी हुई थीं। मैंने उन फूलों के डंठल तक संभालकर रखे थे, जैसे वे किसी बीत चुकी ऋतु की हड्डियाँ हों।धीरे धीरे मुझे एहसास हुआ कि शायद मैं किताबों को नहीं पढ़ रही थी। शायद किताबें मुझे पढ़ रही थीं। मैं तो बस एक दर्शक थी, अपने भीतर खुलते हुए अध्यायों को देखती हुई। कहीं टॉल्सटॉय युद्ध और शांति के बीच मनुष्य की असहायता का अर्थ समझा रहे थे, कहीं ययाति अपनी अतृप्त इच्छाओं का बोझ उठाए मुझे उन युगों में ले जा रहा था जहाँ नियति और लालसा एक दूसरे का गला घोंटती रहती हैं। कहीं कोई देवता मेरे पुण्यों का हिसाब लगा रहा था, तो कहीं कोई दैत्य मेरे गुनाहों को एक एक कर गिनकर मुझे बता रहा था कि दोनों के बीच की दूरी उतनी नहीं होती जितनी कथाएँ हमें यक़ीन दिलाती हैं।
मैं पढ़ी जा रही थी। परत दर परत। शब्द दर शब्द। जैसे कोई प्राचीन ग्रंथ मेरी आत्मा के हाशियों पर झुककर नोट्स लिख रहा हो।फिर एक दिन वह किताब मिली, जिसके किसी साधारण से पन्ने पर तुम्हारा ज़िक्र था।
अजीब बात है, उससे पहले तक मैंने अनगिनत किताबें पढ़ी थीं, पर शायद पहली बार किसी किताब को पढ़ा था। मैं उसके भीतर उतरती चली गई। उसके रेशे रेशे को, उसकी स्याही की नमी को, उसके शब्दों की धड़कन को। पहली बार लगा कि किताबें केवल विचारों का घर नहीं होतीं, वे कभी कभी किसी मनुष्य का पुनर्जन्म भी होती हैं।शायद पहली बार मुझे किताबों से प्रेम हुआ। या शायद पहली बार किताबों ने मुझसे प्रेम किया।
उसके बाद मैं तुम्हें पढ़ती गई। पढ़ती गई। और जितना पढ़ती गई, उतना ही अपने भीतर नई कहानियाँ बुनती गई। उन कहानियों में युद्ध थे, जिनमें सेनाएँ नहीं, स्मृतियाँ लड़ती थीं। प्रेम था, जो गुड़हल के फूलों के रस की तरह उतरता था। सृजन था, सृष्टि थी, ब्रह्मांड था, तारों की अनगिनत मृत रोशनियाँ थीं, और उनके बीच भटकती हुई मैं थी।
पढ़ते पढ़ते मैं ख़ुद एक किताब बन गई थी। एक ऐसी किताब, जिसके कुछ पन्नों पर अब भी तुम्हारा नाम लिखा है, और बाकी पन्नों पर तुम्हारी अनुपस्थिति।
दिशा 🌻
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