आज कल से बेहतर था। आज उसकी याद सुबह उठने के बाद थोड़ी कम आई। शायद कुछ ३ प्रतिशत कम। शायद। मैं धीरे धीरे उसे भुलाने के प्रयास में, उसकी स्मृतियाँ चेतन से अवचेतन मस्तिष्क में ढकेल रही हूँ। मैं अपने प्रयासों में सार्थक हो रही हूँ, ये मुझे चोट कर रहा है। इन्ही प्रयासों में एक दिन ऐसा आजायेगा कि वो मुझे दिन भर नहीं याद आयेगा, दिन भर वो मेरे मन मस्तिष्क में टहलता नहीं रहेगा। अब वो बस स्मृतियों में पनपेगा। कभी कमल बन तो कभी कछुए की तरह। कभी कभी स्मृतियाँ जीवन बन सामने आ खड़ी हो जायेंगी। कभी किसी कीड़े मकोड़े, कभी कोई अट्रैंडम छिपकली, कभी सूरजमुखी, कभी रौशनदान और कभी कोई कविता की पुरानी किताब। अब वो इन सभी मज़बूत लम्हों में ज़िंदा रहेगा।
वो ज़िंदा होगा ही अपनी ज़िंदगी में। साँस लेता, उठता- बैठता, मज़ाक़ करता, ठहाके लगता। कभी देर से उठता, कभी जल्दी उठ फिर सो जाता। तयार होता, टाई लगाता, फूल ख़रीदता, किताबें पढ़ता। घर परिवार से बात चीत करता। नए दोस्त बनाता।
उसे मेरे होने ना होने से तिनके मात्र भी फ़रक नहीं पड़ेगा। मैं उसकी चेतना से कहीं दूर अपनी कब्र बिछा चुकी होऊँगी। उसकी ज़िंदगी में उत्सव आयेंगे, जलसे होंगे, शोक विषाद दौड़ेगा, वो सब झेल लेगा। मैं कहीं दबती चली जाऊँगी। स्टेशन पे पड़ी पुरानी किताब की दुकान में सबसे पुरानी किताब के नीचे। थोड़ी फटी, थोड़ी कुचली।
उसी स्टेशन की उस रोज़ आती जाती गाड़ियों में से एक 'मैं' होंगी। जो रोज़ अपने सामर्थ्य से दोगुने यात्रियों को उठा, उन्हें जैसे तैसे अपने गंतव्य पर पहुचाती है। ज़िंदगी की पटरियों पे दौड़ती साँसों को अब नए आयामों से संजो यात्री अपनी ट्रेन की वाहवाही करेंगे। नए नए मंज़र गुज़रेंगे। कभी पहाड़, कभी झरने, कभी नदी कभी पीपल का पेड़ कभी रेगिस्तान। मैं सबसे गुज़रती जाऊँगी। अपने जीवन के हर मरुस्थल को पार कर मैं अपनी मृगतृष्णा से मिलूँगी। वहाँ रुकूँगी और दो पल रुक कर फिर आगे बढ़ जाऊँगी। मृगतृष्णा से अवबोध मुझे मेरे सपनों की याद दिलाएगा। अवचेतन मस्तिष्क मुझे फिर से प्रेम की समुद्री झील में धकेल कल्पना की कुटिया बना पुकारेगा। मैं अपनी चेतना को संभाल, उसके प्रताप को लपेट, यादों के कंकड़ को झील में फेंकते हुए, फिर सदर पे आगे बढ़ जाऊँगी। सिर्फ़ इसी आस में कि वो भी कहीं सफ़र में ही होगा!
दिशा 🌻
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