दुख को प्रेमपत्र

मैं मिलों मील चल रही हूँ। तुमसे दूर जाने के हर्षक प्रयास में रोज़ विफल हूँ। तुम्हारा होना मेरे संघर्षों की रगों में चुभता रहता है। तुम मेरे सबसे घनिष्ठ मित्र और मेरी हर अधूरी बातों का मुकम्मल जवाब हो।इस पल मेरे जीवन के हर मूलभूत भाव के जनक, तुम। मेरे हर उस भाववाचक संज्ञा को जन्म देते तुम, जो मैंने कक्षा छह में पढ़ी थी और बाक़ी बचें हर उस भाव, भावना जो मैंने किसी भी कक्षा में नहीं पढ़ी। मुझे कभी सिखाई नहीं गई। तुमसे उत्पन्न कितनी ही भावनाओं को संज्ञानित कर सकती हूँ मैं? शायद हज़ारों।
पर मुझे तुमसे दूर जाना है। मिलों दूर। कुछ हज़ार नौ सौ किलोमीटर।मैं कभी मान नहीं सकती कि मैं तुमसे दूर जाना नहीं चाहती। तुम अनपेक्षित हो, अप्रत्याशित हो, अकल्पित हो।

अच्छ! मुझे किसी भी कक्षा में नहीं पढ़ाया गया कि दुख के विशालकाय पेड़ की शाखाओं पे हरी पत्तियाँ भी है पीली भी हैं और कुछ भूरी हैं। दुख का पेड़ मरुस्थल में अकेले खड़ा सभी को राह दिखाता हुआ अपनी जड़ें, जंतु के जन्म से जोड़े खड़ा है।
मैं मोहग्रस्त तुम्हारी ही शाखाओं पे बैठ तुमसे ही दूर कहीं दूर निकलने की तलाश में हूँ। इस बात से पूर्णतः अनजान कि मैं जिससे दूर भाग रही हूँ उसी पर सवार हूँ, उसी की पत्तियों को चबा रही हूँ, उसी का रस घोंट रही हूँ और तुम कबका मेरी चेतना के मूल तत्व बन चुके हो। अब तुम्हारे बिना जीवन बेरंग, बेरस, बेबस है।
तुमसे विशालकाय कुछ नहीं। तुम से सर्वोपरि और कुछ नहीं। तुमको जस का तस अपनाना ही एकमात्र उपाय नज़र आता है। इसी उपाय से सुख की उत्पत्ति होती है। तुमसे ही प्रेम है, भोग है, विलास है, विच्छाद है, अपनापन है, उम्मीद है, उत्साह है, करुणा है, पछतावा है, विरक्ति है, तड़प है, विद्रोह है, विस्मय है। मेरी आत्मा में जन्म लेने वाली हर भावना का स्रोत तुम ही तो हो। तुम हो तो मैं ये महसूस कर पा रही हूँ की मैं भी कहीं ना कहीं हूँ।
तुमसे दूर जाने की कोशिश समंदर के विरुद्ध चलती उस कश्ती जैसी है, जिसे आख़िरकार तुम्हारी ही शाखाएँ किनारे का पता बताती हैं। मैं तुमसे दूर होकर भी तुम्हीं तक लौट आने के लिए बनी हूँ।
दिशा🌻

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