January

जनवरी जैसे आई थी, उससे ज़्यादा तेज़ी से निकल गई। अभी कल ही तो मैं बड़े गंभीर मूड में नए साल का रेज़ोल्यूशन ले रही थी, खुद को बदलने का, ज़िंदगी को ट्रैक पर लाने का, और शायद ब्रह्मांड को भी थोड़ा समझ लेने का। और आज पता चला कि नए साल का पहला महीना ख़त्म हो गया है, बिना किसी औपचारिक सूचना के।

जनवरी दरअसल बहुत चालाक महीना है। आते वक़्त हमें पूरा भरोसा दिलाती है कि “अभी तो साल पड़ा है”, और जाते वक़्त एहसास कराती है कि समय को भरोसे में लेना सबसे बड़ी गलती है। हम सोचते रहे कि अभी बहुत वक्त है, कल से शुरू करेंगे, परसों गंभीर होंगे, अगले हफ्ते जीवन सुधारेंगे। और इसी बीच जनवरी ने अपना काम कर दिया।

सबसे मज़ेदार बात ये है कि हम महीने के ख़त्म होने पर चौंकते हैं, जैसे समय ने कोई नियम तोड़ दिया हो। जबकि नियम तो यही है कि समय हमेशा चलता है, हम ही कभी-कभी रुक जाते हैं। कैलेंडर आगे बढ़ता रहता है और हम वहीं खड़े होकर सोचते हैं कि “अभी तो शुरुआत ही हुई थी।”

जनवरी जाते-जाते बस हल्के व्यंग्य में पूछती है
“इतने प्लान थे, उनमें से तुम खुद कहाँ थे?”

और फिर फरवरी को भेज देती है, एक और मौका बनाकर… जिसे हम शायद फिर अगले महीने समझेंगे।

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