कभी मई का नाम सुनते ही दिमाग में आमरस, कुल्फी और “क्या आज टीवी पर कुछ अच्छा आएगा?” जैसे विचार आते थे। अब वही मई आते ही मोबाइल पर आदेश, मीटिंग की नोटिफिकेशन और बढ़ी हुई ज़िम्मेदारियाँ आती हैं। मई मेरे लिए अब छुट्टियों का मौसम नहीं, “ऑल-इन-वन सुपरवाइजर मोड” का सीज़न है।
मई अब भी वही है—तपता हुआ, चिढ़चिढ़ा, पर यादों से भरा। फर्क बस इतना है कि तब मेरी माँ कहती थीं—“जाओ, बाहर खेल लो”, और अब मैं कहती हूँ—“फुटपाथ साफ़ रखो, लोग बाहर खेलेंगे।”
लेकिन फिर भी, बीच-बीच में कुछ छोटे पल ऐसे मिल जाते हैं—किसी बच्चे की मुस्कान, किसी बुज़ुर्ग की शाबाशी, या बस एक आम का पेड़ जिसकी छांव में कुछ देर बैठकर पुराने दिन याद कर लूं।
तभी समझ आता है—ज़िम्मेदारी थकाती जरूर है, पर खाली नहीं रहने देती।
कभी-कभी लगता है, SDM असल में वो इंसान है जो हर सीज़न को अपने हिसाब से झेलना जानता है—
सर्दी में कोहरे से पहले पहुंचता है, बारिश में खुद भीगता है और गर्मी में दूसरों को छांव देता है।
तो हाँ, मई अब भी आता है—हर साल, तपते सूरज के साथ।
फर्क बस इतना है—अब छुट्टियों की प्लानिंग नहीं करती, उनकी मॉनिटरिंग करती हूँ।
कभी हम छुट्टियाँ मनाते थे, अब हम छुट्टियों को संचालित करते हैं और इस बदलाव में भी एक अनोखी खुशी है।
कभी सोचती हूँ, छुट्टियाँ क्या होती हैं?
शायद जब मन हल्का हो, चेहरे पर मुस्कान हो और काम ‘ड्यूटी’ न लगे—तो वही छुट्टी है।
तो हाँ, काम करते हुए भी अगर दिल बचपन की तरह हँस सके, तो छुट्टी वहीं शुरू होती है।
सप्रेम
दिशा 🌻
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