April

अप्रैल एक ऐसा महीना होता है जो कब आता है और कब निकल जाता है, हम खुद ढूँढते रह जाते हैं। ये उन महीनों में है जो कैलेंडर में नहीं, यादों में गिना जाता है। अप्रैल हमेशा सुंदर महीनों में गिना जाता है। बसंत ऋतु आ रहा होता है, पेड़ों पर नई पत्तियाँ धीरे-धीरे खुल रही होती हैं, हवा में एक नर्मी होती है जो बिना छुए भी छू जाती है, और कुछ पुराना बहुत चुपचाप पीछे छूट रहा होता है।

विलियम शेक्सपियर ने कहा है,
“April hath put a spirit of youth in everything.”

मेरा जन्मदिन भी अप्रैल में ही पड़ता है। पहले जन्मदिन का मतलब होता था रात के बारह बजे का इंतज़ार, फोन की घंटियाँ, और केक काटते वक़्त की वो छोटी-सी खुशी जो पूरे साल याद रहती थी। अब जन्मदिन थोड़ा अलग होता है। उत्सुकता की जगह शायद “शांत स्वीकृति” ने ले ली है, या फिर एक ऐसी खामोशी ने, जिसमें हम खुद को थोड़ा ज़्यादा साफ़ सुन पाते हैं। अब ये दिन जश्न से ज़्यादा एक आईना बन गया है जहाँ मैं खुद को देखती हूँ और बिना ज़्यादा सवाल पूछे बस हल्का सा मुस्कुरा देती हूँ।

पर अच्छा है। अच्छे दोस्त हैं, अच्छे लोग हैं। कुछ सच्चे, कुछ ज़रूरी सब ठीक है। मैं ये बात बार-बार खुद से कहती हूँ, जैसे कोई मंत्र हो, जिसे दोहराते रहने से दिल भटकता नहीं है। काम का बोझ है, लोगों का शोर है कभी-कभी इतना कि अपने ही ख़यालों की आवाज़ दब जाती है। पर उन्हीं के बीच मैं थोड़ी-सी किताबें पकड़कर आगे बढ़ रही हूँ, जैसे भीड़ भरी सड़क पर कोई चुपचाप अपना रास्ता बना लेता है। शब्दों के सहारे खुद तक पहुँचने की ये कोशिश ही शायद अब सबसे सच्ची लगती है।

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