मुझे कभी कुछ नहीं चाहिए था। रात के सबसे शांत पहर में बैठकर सोचती हूँ, तो सच यही लगता है कि मुझे कभी कुछ भी नहीं चाहिए था। अपना थोड़ा बिखरा हुआ, थोड़ा खोया हुआ स्वरूप ही मुझे प्रिय था।
काम हमेशा मुझे संभालता रहा है। अच्छे लोगों के साथ, अच्छे लोगों के लिए काम करना, शायद यही सलेमपुर था। केवल एक तैनाती नहीं, बल्कि जीवन का एक ऐसा अध्याय, जहाँ मैंने स्वयं को सबसे अधिक जाना।
जीवन के सबसे बड़े पड़ाव, सबसे कठिन चुनौतियाँ और सबसे गहरी सीख मुझे यहीं मिलीं। इतने जटिल प्रकरण, इतने उलझे हुए धागे, कि कभी-कभी लगता था जैसे कलम कागज़ पर नहीं, नक्शों और नियतियों पर चल रही हो। अपनी ज़िंदगी के दो सबसे महत्वपूर्ण वर्ष मैंने इन्हीं उलझनों को सुलझाते हुए बिताए, और धीरे-धीरे यह सफ़र एक दायित्व से बढ़कर मेरा अपना हिस्सा बन गया।
मुझे यहाँ इतना स्नेह मिला, इतना सम्मान मिला, कि आज भी लगता है कि मैं शायद इसके योग्य नहीं थी। शायद सच ही है, जब मन कुछ नहीं माँगता, तब सितारे औक़ात से कहीं अधिक दे देते हैं।
मैं अपनी इस कर्मभूमि का ऋण शायद कभी नहीं चुका पाऊँगी। कुछ स्थान केवल जगहें नहीं होते, वे हमारे भीतर बस जाते हैं, हमारी दृष्टि, हमारे निर्णय और हमारी आत्मा का हिस्सा बनकर।
मैं सलेमपुर को हमेशा अपने भीतर एक उजली स्मृति की तरह संजोए रखूँगी। कुछ चेहरों, कुछ मुस्कानों, कुछ अधूरी बातों और अनगिनत सीखों के साथ।
और फिर, इस विश्वास के साथ विदा लेती हूँ—
सितारों को आँखों में महफ़ूज़ रखना,
बड़ी दूर तक रात होगी।
मुसाफ़िर हैं हम भी,
मुसाफ़िर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।
— आपकी दिशा 🌻
