Category: प्रशासन, तुम और मैं

  • याद-ए-सलेमपुर

    याद-ए-सलेमपुर

    मुझे कभी कुछ नहीं चाहिए था। रात के सबसे शांत पहर में बैठकर सोचती हूँ, तो सच यही लगता है कि मुझे कभी कुछ भी नहीं चाहिए था। अपना थोड़ा बिखरा हुआ, थोड़ा खोया हुआ स्वरूप ही मुझे प्रिय था।

    काम हमेशा मुझे संभालता रहा है। अच्छे लोगों के साथ, अच्छे लोगों के लिए काम करना, शायद यही सलेमपुर था। केवल एक तैनाती नहीं, बल्कि जीवन का एक ऐसा अध्याय, जहाँ मैंने स्वयं को सबसे अधिक जाना।

    जीवन के सबसे बड़े पड़ाव, सबसे कठिन चुनौतियाँ और सबसे गहरी सीख मुझे यहीं मिलीं। इतने जटिल प्रकरण, इतने उलझे हुए धागे, कि कभी-कभी लगता था जैसे कलम कागज़ पर नहीं, नक्शों और नियतियों पर चल रही हो। अपनी ज़िंदगी के दो सबसे महत्वपूर्ण वर्ष मैंने इन्हीं उलझनों को सुलझाते हुए बिताए, और धीरे-धीरे यह सफ़र एक दायित्व से बढ़कर मेरा अपना हिस्सा बन गया।

    मुझे यहाँ इतना स्नेह मिला, इतना सम्मान मिला, कि आज भी लगता है कि मैं शायद इसके योग्य नहीं थी। शायद सच ही है, जब मन कुछ नहीं माँगता, तब सितारे औक़ात से कहीं अधिक दे देते हैं।

    मैं अपनी इस कर्मभूमि का ऋण शायद कभी नहीं चुका पाऊँगी। कुछ स्थान केवल जगहें नहीं होते, वे हमारे भीतर बस जाते हैं, हमारी दृष्टि, हमारे निर्णय और हमारी आत्मा का हिस्सा बनकर।

    मैं सलेमपुर को हमेशा अपने भीतर एक उजली स्मृति की तरह संजोए रखूँगी। कुछ चेहरों, कुछ मुस्कानों, कुछ अधूरी बातों और अनगिनत सीखों के साथ।

    और फिर, इस विश्वास के साथ विदा लेती हूँ—

    सितारों को आँखों में महफ़ूज़ रखना,
    बड़ी दूर तक रात होगी।
    मुसाफ़िर हैं हम भी,
    मुसाफ़िर हो तुम भी,
    किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।

    — आपकी दिशा 🌻

  • June

    जून से मुझे इतने गिले-शिकवे क्यों हैं, यह आज तक समझ नहीं पाई। शायद मैं जून से ख़फ़ा थी, शायद जून मुझसे। या शायद दोनों ही अपने अपने अहंकार में मौसम बने बैठे थे। इल्म किसी को नहीं।

    लेकिन एक बात तय है, जून ने मुझे सबसे ज़्यादा गढ़ा है। उसने मेरी हँसी को उसकी पूरी गुंजाइश दी, और मेरे आँसुओं को भी पूरा मंच। उसने मुझे लोगों की मौजूदगी का स्वाद भी चखाया और अनुपस्थिति की कड़वाहट भी। साथ की दरख़्वास्त करना सिखाया, और सहजता की भीख माँगना भी। फिर उन्हीं बिखरे पलों को सूरजमुखियों का गुलदस्ता बनाकर, बड़ी शराफ़त से, घुटनों के बल बैठकर मेरी हथेली में रख दिया, मानो कह रहा हो, “देखो, टूटने का भी एक सौंदर्य होता है।”

    जून ने मुझे होश में लाने वाली वे तीखी-मीठी गोलियाँ भी खिलाईं जिनका कोई मेडिकल नाम नहीं होता। कुछ लोग उन्हें अनुभव कहते हैं, कुछ मोहभंग, और कुछ, ज़िंदगी।

    साल का यह मध्य अजीब होता है। न शुरुआत का उत्साह बचा होता है, न अंत की परिपक्वता आई होती है। बस इंसान कैलेंडर के बीचों-बीच खड़ा होता है, बिल्कुल अपनी उम्र की तरह, इतना बड़ा कि मासूमियत पर यक़ीन न रहे, और इतना बूढ़ा भी नहीं कि उम्मीद से इस्तीफ़ा दे दे।

    मुझे जून से कोई शिकायत नहीं।

    या शायद शिकायतों का इतना बड़ा पहाड़ है कि अब उसकी ऊँचाई दिखाई देना बंद हो गई है।

    एक वक़्त था जब जून मेरा सबसे प्रिय महीना हुआ करता था। स्कूल की घंटियों से आज़ादी, नानी के घर का बुलावा, आमों की ख़ुशबू, दोपहरों की बेहयाई और शामों की बेफ़िक्री, जून तब छुट्टियों का दूसरा नाम था। तब कैलेंडर सिर्फ़ तारीख़ें नहीं पलटता था, बचपन भी खिल उठता था।

    अब जून आता है तो छुट्टियाँ नहीं, हिसाब लाता है। कितना अजीब है कि बड़े होने का मतलब अक्सर अपनी ही रूह का क्लर्क बन जाना होता है. हर भावना की फ़ाइल बनाओ, हर ख़ुशी का दस्तावेज़ माँगो, और हर आँसू की रसीद संभालकर रखो।

    ख़ैर…

    छोड़ आए हम वो गलियाँ, जहाँ जून सिर्फ़ एक महीना था। अब जून यथार्थ है, मेरा आईना है। मेरी गलतियों की डायरी है, मेरी खुशियों की डिबिया है, मेरा सार्थकता से परिचय है और ये महीना मुझमें मुझ से थोड़ा ज़्यादा है।

    दिशा 🌻

  • May

    “मई आई और चली गई।
    कहाँ गई? किसी को ख़बर नहीं।
    न कोई चिट्ठी, न कोई संदेश। अपनी सेहत तक का हाल नहीं बताया। बस आई, कुछ दिन मेरे साथ बैठी, मुझसे मेरा हाल पूछती रही और उसी बहाने अपना हाल भी सुना गई। फिर कंधे उचकाकर बोली, ‘चलता है। जीवन है, सब चलता है।’

    जाते-जाते एक और बात कह गई,
    ‘बहुत बड़ी हो गई हो तुम। अब सब झेल लोगी।’

    मैं सोचती रह गई कि किस रात बड़ी हो गई मैं?
    कौन सी सुबह थी जब बचपना चुपचाप अपना बिस्तर समेटकर चला गया?
    कब शिकायतें जिम्मेदारियों में बदल गईं और आँसू तर्कों में?

    पता नहीं।

    पर दुनिया को पूरा विश्वास है कि अब मैं समझदार हूँ।
    बड़े-बड़े संकटों से लड़ सकती हूँ।
    समस्याओं को मुस्कुराकर निगल सकती हूँ।
    मैं एक मज़बूत, सहनशील, समाज की आधारभूत इकाई हूँ। एक चलता-फिरता साम्राज्य, जिसके कंधों पर अपेक्षाओं की पूरी सभ्यता टिकी हुई है।

    और मज़ेदार बात यह है कि इस साम्राज्य के भीतर आज भी एक बच्ची रहती है, जो कभी-कभी खिड़की से बाहर देखकर सोचती है
    ‘मई तो चली गई…
    पर मेरा थोड़ा-सा हिस्सा भी अपने साथ ले गई क्या?’

    अच्छा! मई में मैं रोई भी, हँसी भी।
    कुछ बातें दिल पर लगीं, कुछ को दिल से उतार दिया।
    खाया, पिया, और जीवन की तरह बहुत कुछ पचा भी लिया।
    कुछ इच्छाएँ पूरी हुईं, कुछ अधूरी रह गईं।
    कुछ लोगों ने साथ दिया, कुछ स्मृतियों में बदल गए।

    और आज, इस महीने को अपने भीतर सावधानी से समेटकर,
    अपने पाप और पुण्य का घड़ा उठाए,
    मैं आगे बढ़ रही हूँ।

    यह कोई विजयगाथा नहीं है, न ही पराजय का वृत्तांत।
    यह केवल समय के साथ चलने की एक साधारण-सी प्रक्रिया है।
    जो यह सिद्ध करती है कि परिस्थितियाँ चाहे अनुकूल हों या प्रतिकूल,
    मनुष्य में आगे बढ़ते रहने की एक अद्भुत क्षमता होती है।

    हर दिन कोई नया उत्तर नहीं देता,
    हर संघर्ष कोई बड़ी सीख नहीं छोड़ता,
    फिर भी जीवन अपनी गति से बहता रहता है।

    जो बीत गया, वह अनुभव बनकर मेरे साथ रहेगा।
    जो शेष है, वह संभावना बनकर सामने खड़ा है।
    और मैं अपने समस्त दोषों, गुणों, भ्रमों, विश्वासों, पापों और पुण्यों सहित अगले अध्याय की ओर बढ़ रही हूँ।

    न किसी विशेष गर्व के साथ,
    न किसी विशेष पश्चाताप के साथ,
    बस एक शांत स्वीकृति के साथ कि
    यात्रा अभी जारी है।”

  • क्या मैं वही हूँ?

    आज रविवार को दिनचर्या धीमी थी। काम तो हमेशा की तरह थे, पर मैं ख़ुद धीमी थी। और आप ये न समझें कि इससे मुझे ज़रा भी चिंता हुई हो नहीं, मैं तो ख़ुश थी। हफ़्ते में एक दिन तो मिल ही जाता है, बस ठहरकर तर्ज़ से चलते लोगों को निहारने का, पुरानी आदतों और शौक़ों की धूल झाड़कर उन्हें फिर से सँवारने का। हाँ, ये अलग बात है कि मैंने इनमें से कुछ भी नहीं किया। फिर भी, मन संतोष से भरा रहा। क्योंकि जो भी है,धीमा है, और यही धीमापन अपने आप में सुंदर है।

    सुबह उठते आँख आधी ही खुली थी कि माँ के ढेरों मैसेज एक साथ बज उठे। खोला तो देखा, कुछ पुरानी यादों की तस्वीरें थीं, तस्वीरों की तस्वीरे। जैसे वक़्त को किसी ने पलटकर हाथ में रख दिया हो। मैं काफ़ी देर तक उन्हें देखती रही। फिर आईने में ख़ुद को देखा और भीतर एक प्रश्न गूंजा!

    क्या मैं वही हूँ, जो कभी अपने भाषणों में, वाद-विवादों में, माइक पकड़कर पूरे आत्मविश्वास से कहती थी?क्या आज का मेरा अस्तित्व उस कल की आकांक्षा से मेल खाता है?क्या मैं एक प्रतिशत भी वो बन पाई हूँ, जो कभी बनना चाहती थी? क्या मैंने सच में मंच के इस पार से उस पार तक का सफ़र तय कर लिया है? क्या मैं सच में कुछ कभी थी? कुछ कभी बन पायी? कुछ कभी बन पाऊँगी?

    शायद नहीं! शायद हाँ! शायद!

    पर जब ख़ुद को दस–पंद्रह साल आगे से देखा, तो मन में जो एहसास उठा उसे किस भाववाचक संज्ञा में बाँध दूँ, ये मुझे समझ ही नहीं आया। वो एहसास कभी आशंका-सा लगा, कभी संतोष-सा, कभी पछतावा, कभी आशा।लगने लगा जैसे कल की ही तो बात हो कार्मेल स्कूल का वही स्टेज, स्टेज पर चढ़ने से पहले काँपते हाथ, थरथराते पैर, भूलता हुआ स्क्रिप्ट,
    चेहरों की भीड़ और उनमें छुपा हुआ मेरा डर।

    धुँधला भविष्य उस वक़्त कितना भय, कितना संकोच, और साथ ही कितनी आकांक्षा से भरा हुआ था। अपनी इस डगमगाती-सी दुनिया में सब कुछ अनिश्चित था। हर कदम, हर उम्मीद, हर सपना।

    पर एक चीज़ थी जो अटल रही, वो था मेरा आत्मविश्वास। ना जाने किस पर था, किससे था, पर था।तो मैं आगे कितनी आई, नहीं पता। क्या वो बन पाई, जो कभी बनना चाहती थी, नहीं पता। पर इस पूरी यात्रा के बीच, मैंने ख़ुद से सवाल करना कभी बंद नहीं किया। हर रोज़ आईने में झाँककर पूछ लेती हूँ
    “क्या मैं आज भी वही हूँ,
    या फिर कुछ और बन चुकी हूँ?”

    शायद यही मेरा हासिल है,
    शायद यही मेरी सबसे बड़ी कामयाबी
    और यही सवाल पूछने की हिम्मत ही
    मेरा अपना क्षितिज!

    दिशा 🌸

  • बारिश

    पहले बारिश का मतलब था स्कूल की छुट्टी, छत पर कागज़ की नावें, खिड़की के शीशों पर बहती बूंदें और रसोई से आती गरम चाय-पकौड़ों की ख़ुशबू। तब बादल गरजते थे, तो दिल हँसता था। भीगना कोई मजबूरी नहीं, एक खेल था। मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू में बचपन की मस्ती घुली होती थी।

    अब वही बारिश आती है, तो मीटिंग का समय टलता नहीं, बस Wi-Fi डगमगाता है। दफ़्तर नहीं रुकता, बस सड़कों पर जाम लगता है। अब फ़र्ज़ की छतरी ओढ़ कर चलते हैं।भीगना अब दिल को नहीं, फ़ोन को भारी पड़ता है। तब माँ पुकारती थी ‘भीग मत जाना’, अब सिस्टम कहता है, ‘डेडलाइन मत भूलना’।

    वही मौसम है, वही बादल, वही बूँदें।
    पर अब हम बदल गए हैं। या शायद नहीं!🦋

  • कलम पीछे छूट गयी

    मैं आगे दूर पहाड़ों से शहर आ गयी।

    यहाँ सुबह उठ सब बाट जोहते हैं
    मेरी शहर में शाम नहीं होती।
    दिन गिरती समुद्र की लहर समान
    रात से सुबह और आँखें खुली की खुली।

    इस जगह सब मुझे जानते है मैं किसी को नहीं।
    यहाँ वक़्त हमेशा कम है,
    और मैं हर पल व्याकुल ।

    सृजनात्मकता का अल्हड़पन गुम है,
    मुस्कान, हाव भाव, चाल ढाल आँखें पाबंद
    अनुपात में घुलना मिलना है सबसे,
    दृश्य अदृश्य और बातें उससे भी कम

    दिशा🌻

  • April

    अप्रैल एक ऐसा महीना होता है जो कब आता है और कब निकल जाता है, हम खुद ढूँढते रह जाते हैं। ये उन महीनों में है जो कैलेंडर में नहीं, यादों में गिना जाता है। अप्रैल हमेशा सुंदर महीनों में गिना जाता है। बसंत ऋतु आ रहा होता है, पेड़ों पर नई पत्तियाँ धीरे-धीरे खुल रही होती हैं, हवा में एक नर्मी होती है जो बिना छुए भी छू जाती है, और कुछ पुराना बहुत चुपचाप पीछे छूट रहा होता है।

    विलियम शेक्सपियर ने कहा है,
    “April hath put a spirit of youth in everything.”

    मेरा जन्मदिन भी अप्रैल में ही पड़ता है। पहले जन्मदिन का मतलब होता था रात के बारह बजे का इंतज़ार, फोन की घंटियाँ, और केक काटते वक़्त की वो छोटी-सी खुशी जो पूरे साल याद रहती थी। अब जन्मदिन थोड़ा अलग होता है। उत्सुकता की जगह शायद “शांत स्वीकृति” ने ले ली है, या फिर एक ऐसी खामोशी ने, जिसमें हम खुद को थोड़ा ज़्यादा साफ़ सुन पाते हैं। अब ये दिन जश्न से ज़्यादा एक आईना बन गया है जहाँ मैं खुद को देखती हूँ और बिना ज़्यादा सवाल पूछे बस हल्का सा मुस्कुरा देती हूँ।

    पर अच्छा है। अच्छे दोस्त हैं, अच्छे लोग हैं। कुछ सच्चे, कुछ ज़रूरी सब ठीक है। मैं ये बात बार-बार खुद से कहती हूँ, जैसे कोई मंत्र हो, जिसे दोहराते रहने से दिल भटकता नहीं है। काम का बोझ है, लोगों का शोर है कभी-कभी इतना कि अपने ही ख़यालों की आवाज़ दब जाती है। पर उन्हीं के बीच मैं थोड़ी-सी किताबें पकड़कर आगे बढ़ रही हूँ, जैसे भीड़ भरी सड़क पर कोई चुपचाप अपना रास्ता बना लेता है। शब्दों के सहारे खुद तक पहुँचने की ये कोशिश ही शायद अब सबसे सच्ची लगती है।

  • January

    जनवरी जैसे आई थी, उससे ज़्यादा तेज़ी से निकल गई। अभी कल ही तो मैं बड़े गंभीर मूड में नए साल का रेज़ोल्यूशन ले रही थी, खुद को बदलने का, ज़िंदगी को ट्रैक पर लाने का, और शायद ब्रह्मांड को भी थोड़ा समझ लेने का। और आज पता चला कि नए साल का पहला महीना ख़त्म हो गया है, बिना किसी औपचारिक सूचना के।

    जनवरी दरअसल बहुत चालाक महीना है। आते वक़्त हमें पूरा भरोसा दिलाती है कि “अभी तो साल पड़ा है”, और जाते वक़्त एहसास कराती है कि समय को भरोसे में लेना सबसे बड़ी गलती है। हम सोचते रहे कि अभी बहुत वक्त है, कल से शुरू करेंगे, परसों गंभीर होंगे, अगले हफ्ते जीवन सुधारेंगे। और इसी बीच जनवरी ने अपना काम कर दिया।

    सबसे मज़ेदार बात ये है कि हम महीने के ख़त्म होने पर चौंकते हैं, जैसे समय ने कोई नियम तोड़ दिया हो। जबकि नियम तो यही है कि समय हमेशा चलता है, हम ही कभी-कभी रुक जाते हैं। कैलेंडर आगे बढ़ता रहता है और हम वहीं खड़े होकर सोचते हैं कि “अभी तो शुरुआत ही हुई थी।”

    जनवरी जाते-जाते बस हल्के व्यंग्य में पूछती है
    “इतने प्लान थे, उनमें से तुम खुद कहाँ थे?”

    और फिर फरवरी को भेज देती है, एक और मौका बनाकर… जिसे हम शायद फिर अगले महीने समझेंगे।

  • मैं, मई और मेरी छुट्टियाँ:)

    कभी मई का नाम सुनते ही दिमाग में आमरस, कुल्फी और “क्या आज टीवी पर कुछ अच्छा आएगा?” जैसे विचार आते थे। अब वही मई आते ही मोबाइल पर आदेश, मीटिंग की नोटिफिकेशन और बढ़ी हुई ज़िम्मेदारियाँ आती हैं। मई मेरे लिए अब छुट्टियों का मौसम नहीं, “ऑल-इन-वन सुपरवाइजर मोड” का सीज़न है।

    मई अब भी वही है—तपता हुआ, चिढ़चिढ़ा, पर यादों से भरा। फर्क बस इतना है कि तब मेरी माँ कहती थीं—“जाओ, बाहर खेल लो”, और अब मैं कहती हूँ—“फुटपाथ साफ़ रखो, लोग बाहर खेलेंगे।”

    लेकिन फिर भी, बीच-बीच में कुछ छोटे पल ऐसे मिल जाते हैं—किसी बच्चे की मुस्कान, किसी बुज़ुर्ग की शाबाशी, या बस एक आम का पेड़ जिसकी छांव में कुछ देर बैठकर पुराने दिन याद कर लूं।
    तभी समझ आता है—ज़िम्मेदारी थकाती जरूर है, पर खाली नहीं रहने देती।

    कभी-कभी लगता है, SDM असल में वो इंसान है जो हर सीज़न को अपने हिसाब से झेलना जानता है—
    सर्दी में कोहरे से पहले पहुंचता है, बारिश में खुद भीगता है और गर्मी में दूसरों को छांव देता है।

    तो हाँ, मई अब भी आता है—हर साल, तपते सूरज के साथ।
    फर्क बस इतना है—अब छुट्टियों की प्लानिंग नहीं करती, उनकी मॉनिटरिंग करती हूँ।

    कभी हम छुट्टियाँ मनाते थे, अब हम छुट्टियों को संचालित करते हैं और इस बदलाव में भी एक अनोखी खुशी है।
    कभी सोचती हूँ, छुट्टियाँ क्या होती हैं?
    शायद जब मन हल्का हो, चेहरे पर मुस्कान हो और काम ‘ड्यूटी’ न लगे—तो वही छुट्टी है।
    तो हाँ, काम करते हुए भी अगर दिल बचपन की तरह हँस सके, तो छुट्टी वहीं शुरू होती है।

    सप्रेम
    दिशा 🌻

  • तिथ्या, चंपक और वो छोटी सी याद

    कभी-कभी ज़िंदगी की आपाधापी में, बड़े-बड़े लक्ष्यों और भारी-भरकम ज़िम्मेदारियों के पीछे भागते हुए हम उन छोटी-छोटी खुशियों को भूल जाते हैं, जो हमारे वजूद की सबसे कोमल परतों को छूती हैं। आज का दिन भी कुछ ऐसा ही था — स्थल निरीक्षण पर एक जटिल समस्या के समाधान हेतु मैं मौके पर पहुँची थी। सिविल सेवाओं की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि दिनभर अनेक प्रकार की चुनौतियाँ सामने आती रहती हैं।

    काम पूरे जोश में था। फ़ील्ड में हलचल थी, अधिकारी थे, स्थानीय लोग थे, शिकायतें थीं, समाधान की तलाश थी। सब कुछ अपने ढर्रे पर चल रहा था। मैं भी पूरी तरह से काम में डूबी थी, जब अचानक एक नन्ही सी लड़की मेरी तरफ़ दौड़ती हुई आई — हाथ में एक नीली कलम, आँखों में जिज्ञासा और चेहरे पर मासूम मुस्कान।

    “मैं तिथ्या हूँ!” उसने कहा।

    वो मोम सी कोमल थी, और उसकी बातें काजू कतली सी मीठी। वो मुझे अपने किसी गंभीर सपने के बारे में बता रही थी कुछ अजीब, कुछ दिलचस्प। उसकी चंचलता में वो मासूम जादू था, जो व्यस्ततम दिन में भी ठहराव ले आता है।

    मैं बैठ गई। उसने पहाड़े सुनाए, गिनती दोहराई, और मेरी गोद को अपना सिंहासन मान बैठी।उसकी मुस्कान ने जैसे दिन भर की थकान धो दी।
    थोड़ी देर बाद, चिंटू और महिमा भी आ गए।दोनों ही अपने अंदाज़ में बेहद चुलबुले, मगर बातों में समझदारी की झलक साफ़ थी। उनकी बातों में मुझे अपने बचपन की वो शामें याद आ गईं, जब “चंपक”, “नंदन”, और “बालहंस” मेरी दुनिया हुआ करते थे।

    हमने हँसी-मज़ाक किया, कुछ सवाल-जवाब हुए, और फिर सबने मिलकर असल समस्या को समझा और सुलझाया। जैसे इन बच्चों ने भी अपना योगदान दिया हो।

    वो कुछ मिनट, वो हँसी, वो पहाड़े और वो मासूम सपने — मुझे एक बार फिर याद दिला गए कि मैं सिविल सेवा में क्यों आई थी।

    कागज़ी काम, प्रशासनिक आदेश, फ़ील्ड निरीक्षण — ये सब महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इन सबसे बढ़कर है लोगों से मिलना, उनकी ज़िंदगी को समझना, उन्हें सुनना। मैं हमेशा से यह चाहती थी — लोगों से संवाद, उनकी समस्याओं का समाधान, और हर किसी को यह महसूस कराना कि वे देखे और सुने जा रहे हैं।

    तिथ्या, चिंटू और महिमा — आज के दिन के सबसे अहम पात्र थे। उन्होंने मुझे ये नहीं बताया कि एक पुल कैसे बनता है या कोई नाली कैसे साफ़ होती है, लेकिन उन्होंने वो याद दिला दिया जो वक़्त के साथ कभी-कभी धुंधला होने लगता है — इंसानियत, जुड़ाव और सच्चे सेवा भाव की अहमियत।

    शायद हर अफसर को कभी न कभी ऐसे लम्हों की ज़रूरत होती है — जो उसे उसके ‘क्यों’ की याद दिला सके।

    दिशा 🌻