आज रविवार को दिनचर्या धीमी थी। काम तो हमेशा की तरह थे, पर मैं ख़ुद धीमी थी। और आप ये न समझें कि इससे मुझे ज़रा भी चिंता हुई हो नहीं, मैं तो ख़ुश थी। हफ़्ते में एक दिन तो मिल ही जाता है, बस ठहरकर तर्ज़ से चलते लोगों को निहारने का, पुरानी आदतों और शौक़ों की धूल झाड़कर उन्हें फिर से सँवारने का। हाँ, ये अलग बात है कि मैंने इनमें से कुछ भी नहीं किया। फिर भी, मन संतोष से भरा रहा। क्योंकि जो भी है,धीमा है, और यही धीमापन अपने आप में सुंदर है।
सुबह उठते आँख आधी ही खुली थी कि माँ के ढेरों मैसेज एक साथ बज उठे। खोला तो देखा, कुछ पुरानी यादों की तस्वीरें थीं, तस्वीरों की तस्वीरे। जैसे वक़्त को किसी ने पलटकर हाथ में रख दिया हो। मैं काफ़ी देर तक उन्हें देखती रही। फिर आईने में ख़ुद को देखा और भीतर एक प्रश्न गूंजा!
क्या मैं वही हूँ, जो कभी अपने भाषणों में, वाद-विवादों में, माइक पकड़कर पूरे आत्मविश्वास से कहती थी?क्या आज का मेरा अस्तित्व उस कल की आकांक्षा से मेल खाता है?क्या मैं एक प्रतिशत भी वो बन पाई हूँ, जो कभी बनना चाहती थी? क्या मैंने सच में मंच के इस पार से उस पार तक का सफ़र तय कर लिया है? क्या मैं सच में कुछ कभी थी? कुछ कभी बन पायी? कुछ कभी बन पाऊँगी?
शायद नहीं! शायद हाँ! शायद!
पर जब ख़ुद को दस–पंद्रह साल आगे से देखा, तो मन में जो एहसास उठा उसे किस भाववाचक संज्ञा में बाँध दूँ, ये मुझे समझ ही नहीं आया। वो एहसास कभी आशंका-सा लगा, कभी संतोष-सा, कभी पछतावा, कभी आशा।लगने लगा जैसे कल की ही तो बात हो कार्मेल स्कूल का वही स्टेज, स्टेज पर चढ़ने से पहले काँपते हाथ, थरथराते पैर, भूलता हुआ स्क्रिप्ट,
चेहरों की भीड़ और उनमें छुपा हुआ मेरा डर।
धुँधला भविष्य उस वक़्त कितना भय, कितना संकोच, और साथ ही कितनी आकांक्षा से भरा हुआ था। अपनी इस डगमगाती-सी दुनिया में सब कुछ अनिश्चित था। हर कदम, हर उम्मीद, हर सपना।
पर एक चीज़ थी जो अटल रही, वो था मेरा आत्मविश्वास। ना जाने किस पर था, किससे था, पर था।तो मैं आगे कितनी आई, नहीं पता। क्या वो बन पाई, जो कभी बनना चाहती थी, नहीं पता। पर इस पूरी यात्रा के बीच, मैंने ख़ुद से सवाल करना कभी बंद नहीं किया। हर रोज़ आईने में झाँककर पूछ लेती हूँ
“क्या मैं आज भी वही हूँ,
या फिर कुछ और बन चुकी हूँ?”
शायद यही मेरा हासिल है,
शायद यही मेरी सबसे बड़ी कामयाबी
और यही सवाल पूछने की हिम्मत ही
मेरा अपना क्षितिज!
दिशा 🌸
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