जून से मुझे इतने गिले-शिकवे क्यों हैं, यह आज तक समझ नहीं पाई। शायद मैं जून से ख़फ़ा थी, शायद जून मुझसे। या शायद दोनों ही अपने अपने अहंकार में मौसम बने बैठे थे। इल्म किसी को नहीं।
लेकिन एक बात तय है, जून ने मुझे सबसे ज़्यादा गढ़ा है। उसने मेरी हँसी को उसकी पूरी गुंजाइश दी, और मेरे आँसुओं को भी पूरा मंच। उसने मुझे लोगों की मौजूदगी का स्वाद भी चखाया और अनुपस्थिति की कड़वाहट भी। साथ की दरख़्वास्त करना सिखाया, और सहजता की भीख माँगना भी। फिर उन्हीं बिखरे पलों को सूरजमुखियों का गुलदस्ता बनाकर, बड़ी शराफ़त से, घुटनों के बल बैठकर मेरी हथेली में रख दिया, मानो कह रहा हो, “देखो, टूटने का भी एक सौंदर्य होता है।”
जून ने मुझे होश में लाने वाली वे तीखी-मीठी गोलियाँ भी खिलाईं जिनका कोई मेडिकल नाम नहीं होता। कुछ लोग उन्हें अनुभव कहते हैं, कुछ मोहभंग, और कुछ, ज़िंदगी।
साल का यह मध्य अजीब होता है। न शुरुआत का उत्साह बचा होता है, न अंत की परिपक्वता आई होती है। बस इंसान कैलेंडर के बीचों-बीच खड़ा होता है, बिल्कुल अपनी उम्र की तरह, इतना बड़ा कि मासूमियत पर यक़ीन न रहे, और इतना बूढ़ा भी नहीं कि उम्मीद से इस्तीफ़ा दे दे।
मुझे जून से कोई शिकायत नहीं।
या शायद शिकायतों का इतना बड़ा पहाड़ है कि अब उसकी ऊँचाई दिखाई देना बंद हो गई है।
एक वक़्त था जब जून मेरा सबसे प्रिय महीना हुआ करता था। स्कूल की घंटियों से आज़ादी, नानी के घर का बुलावा, आमों की ख़ुशबू, दोपहरों की बेहयाई और शामों की बेफ़िक्री, जून तब छुट्टियों का दूसरा नाम था। तब कैलेंडर सिर्फ़ तारीख़ें नहीं पलटता था, बचपन भी खिल उठता था।
अब जून आता है तो छुट्टियाँ नहीं, हिसाब लाता है। कितना अजीब है कि बड़े होने का मतलब अक्सर अपनी ही रूह का क्लर्क बन जाना होता है. हर भावना की फ़ाइल बनाओ, हर ख़ुशी का दस्तावेज़ माँगो, और हर आँसू की रसीद संभालकर रखो।
ख़ैर…
छोड़ आए हम वो गलियाँ, जहाँ जून सिर्फ़ एक महीना था। अब जून यथार्थ है, मेरा आईना है। मेरी गलतियों की डायरी है, मेरी खुशियों की डिबिया है, मेरा सार्थकता से परिचय है और ये महीना मुझमें मुझ से थोड़ा ज़्यादा है।
दिशा 🌻
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