पहले बारिश का मतलब था स्कूल की छुट्टी, छत पर कागज़ की नावें, खिड़की के शीशों पर बहती बूंदें और रसोई से आती गरम चाय-पकौड़ों की ख़ुशबू। तब बादल गरजते थे, तो दिल हँसता था। भीगना कोई मजबूरी नहीं, एक खेल था। मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू में बचपन की मस्ती घुली होती थी।
अब वही बारिश आती है, तो मीटिंग का समय टलता नहीं, बस Wi-Fi डगमगाता है। दफ़्तर नहीं रुकता, बस सड़कों पर जाम लगता है। अब फ़र्ज़ की छतरी ओढ़ कर चलते हैं।भीगना अब दिल को नहीं, फ़ोन को भारी पड़ता है। तब माँ पुकारती थी ‘भीग मत जाना’, अब सिस्टम कहता है, ‘डेडलाइन मत भूलना’।
वही मौसम है, वही बादल, वही बूँदें।
पर अब हम बदल गए हैं। या शायद नहीं!🦋
Leave a Reply