“मई आई और चली गई।
कहाँ गई? किसी को ख़बर नहीं।
न कोई चिट्ठी, न कोई संदेश। अपनी सेहत तक का हाल नहीं बताया। बस आई, कुछ दिन मेरे साथ बैठी, मुझसे मेरा हाल पूछती रही और उसी बहाने अपना हाल भी सुना गई। फिर कंधे उचकाकर बोली, ‘चलता है। जीवन है, सब चलता है।’
जाते-जाते एक और बात कह गई,
‘बहुत बड़ी हो गई हो तुम। अब सब झेल लोगी।’
मैं सोचती रह गई कि किस रात बड़ी हो गई मैं?
कौन सी सुबह थी जब बचपना चुपचाप अपना बिस्तर समेटकर चला गया?
कब शिकायतें जिम्मेदारियों में बदल गईं और आँसू तर्कों में?
पता नहीं।
पर दुनिया को पूरा विश्वास है कि अब मैं समझदार हूँ।
बड़े-बड़े संकटों से लड़ सकती हूँ।
समस्याओं को मुस्कुराकर निगल सकती हूँ।
मैं एक मज़बूत, सहनशील, समाज की आधारभूत इकाई हूँ। एक चलता-फिरता साम्राज्य, जिसके कंधों पर अपेक्षाओं की पूरी सभ्यता टिकी हुई है।
और मज़ेदार बात यह है कि इस साम्राज्य के भीतर आज भी एक बच्ची रहती है, जो कभी-कभी खिड़की से बाहर देखकर सोचती है
‘मई तो चली गई…
पर मेरा थोड़ा-सा हिस्सा भी अपने साथ ले गई क्या?’
अच्छा! मई में मैं रोई भी, हँसी भी।
कुछ बातें दिल पर लगीं, कुछ को दिल से उतार दिया।
खाया, पिया, और जीवन की तरह बहुत कुछ पचा भी लिया।
कुछ इच्छाएँ पूरी हुईं, कुछ अधूरी रह गईं।
कुछ लोगों ने साथ दिया, कुछ स्मृतियों में बदल गए।
और आज, इस महीने को अपने भीतर सावधानी से समेटकर,
अपने पाप और पुण्य का घड़ा उठाए,
मैं आगे बढ़ रही हूँ।
यह कोई विजयगाथा नहीं है, न ही पराजय का वृत्तांत।
यह केवल समय के साथ चलने की एक साधारण-सी प्रक्रिया है।
जो यह सिद्ध करती है कि परिस्थितियाँ चाहे अनुकूल हों या प्रतिकूल,
मनुष्य में आगे बढ़ते रहने की एक अद्भुत क्षमता होती है।
हर दिन कोई नया उत्तर नहीं देता,
हर संघर्ष कोई बड़ी सीख नहीं छोड़ता,
फिर भी जीवन अपनी गति से बहता रहता है।
जो बीत गया, वह अनुभव बनकर मेरे साथ रहेगा।
जो शेष है, वह संभावना बनकर सामने खड़ा है।
और मैं अपने समस्त दोषों, गुणों, भ्रमों, विश्वासों, पापों और पुण्यों सहित अगले अध्याय की ओर बढ़ रही हूँ।
न किसी विशेष गर्व के साथ,
न किसी विशेष पश्चाताप के साथ,
बस एक शांत स्वीकृति के साथ कि
यात्रा अभी जारी है।”
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