अहम् की प्राप्ति में, सत्तर प्रतिशत खर्च हो चुका हूँ। अब पूरा का पूरा समुंदर बनाने, और एक बूँद समान उसमे, अपनी हस्ती मिटा देने में कोई अंतर नहीं बचा है।
मैं कतरा कतरा अपनी ज़िन्दगी उजाड़ रहा हूँ आशा के भ्रम में हूँ। मैं निराशा की चादर ओढ़े, शून्य में निहारता, मुक्तिबोध का इंतज़ार कर रहा हूँ।
बचे तीस प्रतिशत अहम् को मैंने बचा के रखा है। तुम्हारे इंतज़ार में पथरायी आँखों के त्रिभुज पर मेरा एक कतरा आँसू अभी भी झुर्रियों की सीढ़ियाँ नहीं उतर रहा है।
जिस दिन तुम्हारे होने का कच्चा सपना टूट के मेरी सबसे सुंदर मोती वाली माला की तरह हम दोनों के हाथ से सजाए हमारे बगीचे के बीच टूट के पूरी तरह बिखर जाएगा अहम् पूरा खर्च हो जाएगा ।
मेरी हद ये है कि मेरी कोई हद नहीं ना प्यार में ना इकरार में दुश्मनी में दोस्ती में मेरी कोई हद नहीं। जितना सुकून खुद को बना देने में है शायद उतना ही पूरी तरह मिटा देने में भी। ये इतिहास में ईंसाफ़ में ताकीज़े इकरार में फनकार में मेरी कोई हद नहीं है।
मैं जगह जगह जाऊँ हाथ मिलाऊँ सब सबके मुताबिक लिख दूँ लोग तमीज़दार बोले गाली गलौच करें, मुझे इंसानियत की हद याद दिलाए पर मैं हद ना खोज पाऊँ।
ना जाने कहाँ गिरूँ कंकड़ खाऊँ लोग भगायें फ़कीर बन चौखट चौखट अल्लाह से खुद को माँगूँ लोग पागल का दर्जा दे सिर फोड़ दे दूर भगां बेहद का सिरफिरा घूम रहा है गाँव गाँव पर मैं अपनी हद ना खोज पाऊँ।
शायद, मेरी हद ये है कि मेरी कोई हद नहीं। ना इंसानियत में ना हैवानियत में ना बुद्ध में ना कृष्ण में। मेरी कोई हद नहीं है।
ख़ुद को खोजने की इस मुठभेड़ में मैं नंगे पाओं घर से निकल आया। इधर भागा उधर दौड़ा बिजली के तारों सी उलझी गलियाँ गिरते पड़ते चोटिल उठते बैठते जूतों की याद हमेशा आती रही।
लाखों कंकड़ लड़े, कोमल तलुए छिल गए गोरे गोरे नन्हे पैरों पे काले धब्बे बड़े बड़े छाले से जूतों की याद हमेशा आती रही।
सूजे पैर जब उठ ना सके चल ना पाया जब मैं इंच भर खड़ा ना हो पाया एक पैर पे उचका लड़खड़ाया गिरा मुंह के बल जूतों की याद हमेशा आती रही।
किसी ने ना पूछी कुर्सी, पेड़ों तक ने डालियाँ समेट ली, लहूलुहान पाओं मेरे कतरा कतरा ढूँढते रहे धरती जूतों की याद हमेशा आती रही।
मैं बेहोश अधमरा अब अपने पहाड़ पे खड़ा था मेरे तलुए के मांस से हड्डियां झाँक रही थी मैं अब उस मंज़िल की हवा में साँस ले रहा था पैर बचें थे या नहीं अब फ़र्क़ पड़ता नहीं था मैं ना जाने और कितने मील दौड़ सकता था जूतों की मुझे ज़रूरत नहीं थी। दिशा 🌻
वो आज वर्ल्ड हिस्ट्री की क्लास में आप रह रह के शून्य में देखने लग रही थी ना।जैसे हिटलर को हराने की कोई नयी तरकीब सोच रही हों।
आप मुझे कुछ ज़्यादा ही गौर से नहीं देख रहे हैं?
बग़ल में रोल नो है आपके।मैं जान बूझ के नहीं कर रहा था कुछ।
हाहा।अभी एक महीना ही हुआ है क़रोल बाघ आये। एकाग्रता तो सीख ही रही हूँ अभी।
सिविल सेवा परीक्षा,त्यागी ज़िंदगी के सबसे महत्वपूर्ण पाठ आसानी से सिखा देती है। आप निश्चिंत रहिए। बस बहते जाइए।
बहने के लिए नदियों का रुख़ जानना पड़ेगा। मुझसे यहाँ की गालियाँ ही नहीं पढ़ी जाती।
अरे तो पानी के साथ हो लीजिये। हर एक गली, कोई भी गली आपको आपकी मंज़िल की ही ओर पहुँचायेगी।
आप परिपक्व लग रहे हैं।कितना वक़्त हो गया यहाँ?
घड़ी तो मैंने २ साल पहले ही देखना बंद कर दिया था।लास्ट टाइम इंटरव्यू के टाइम ही कलाई घुमायी थी और आँखें सुइयों की तरफ़ पड़ी थी। तबसे उसी वक़्त के इंतज़ार में वक़्त कट रहा है।
हिन्दी साहित्य ऑप्शनल है ना आपका?
हाहा नहीं फिजिक्स।
मुझे डर लग रहा है।मुझसे नहीं होगा।पता नहीं आपसे क्यों बता रही मैं ये। मैं तो आपका नाम तक नहीं जानती।
अरे। हम सब एक ही दर्द के मारे हैं। अपने नाम से ज़्यादा यहाँ कोचिंग और रैंक से हम सब जाने जाते हैं। और डर लगना तो लाज़मी है।उसके बिना कहाँ ही कुछ संभव हुआ है आज तक।अपने डर को मोनेटाइज़ नहीं होने देना है बस। जितना डर आपको लगेगा,ख़रीदार उतने ही बढ़ते जाएँगे। कोई आपको A B C D लिखना सिखाने लगेगा तो कोई पेपर पढ़ना।आप बस अपना डर ख़ुद सम्भालिये। सब कुछ आपके अंदर ही है। डर,हार,जीत,सफलता,असफलता सब आप ही हैं।
आपको ऑप्शनल बदलने का सोचना चाहिए वैसे।
हाहा। अरे इस बार बहुत उम्मीदें हैं। फिजिक्स ही पार लगाएगा।
समझी।
अच्छा इतना बोल दिया है तो एक मुफ़्त कि सलाह और मार देता हूँ।
जी ज़रूर।
हमेशा पोहे में प्याज़ ऊपर से डलवाइयेगा, चाय ठेले से ही पीजियेगा,बहुत कम लोगों से बात करियेगा और रोज़ अपने अंदर ही अंदर डरियेगा, हर दिन। ये डर ख़त्म नहीं होना चाहिए और किसी को पता नहीं चलना चाहिए।
धन्यवाद। शायद मुझे इसी की ज़रूरत थी।
अरे एकदम। एकदम।गुडबाय।
आपका नाम?
परसों तक शायद रिजल्ट आ रहा है। आशा करता हूँ उसमें नाम मिल जाये आपको। और अगर नहीं मिला तो यहीं टेस्ट सेंटर पे मिलूँगा।पूछ लीजियेगा।