तुम मुझे क्या समझाओगे,
क्या मुझे संसार से रूबरू करवाओगे।
मैं उड़ती हूँ,
मैं हवा हूँ।
इस संसार से कहीं कोसों दूर,
एक क्षितिज है।
रहती हूँ मैं,
घरौंदे सच से बायें जाकर दक्षिण,
आशियाना झूठ से बत्तीस मंजिले ऊपर।
वहाँ आँखें बंद करने पे,
एक किवाड़ दिखेगी।
हिम्मत हो तो,
आगे बढ़ के खटखटाना।
कोई खोलेगा नहीं,
तुम फिर भी खटखटाना।
मैं अंदर व्ययस्थ होंगी,
कोई कुंडी नहीं खोलेगा।
तुम घर का नाम “कल्पना”
पढ़ के लौट आना।
दिशा 🌻
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