शाख़ से गिरा फूल

अपनी ज़िंदगी की आज आख़िरी साँस ली है। आज ही मेरी मौत हुई है।आज ही मैं अपने मूजिद से जुदा होकर ज़मीन पर गिरा हूँ। यहाँ नीचे मेरे जैसे न जाने कितने फूल मरे पड़े हैं, कुछ मेरे साथ गिरे, कुछ ने मुझसे थोड़ा कम जिया, कुछ ने थोड़ा ज़्यादा। मगर आख़िर में सबका हिसाब एक ही मिट्टी ने बराबर कर दिया।

कुछ ऐसे भी हैं जो कल मर चुके थे, मगर आज भी वापिस लौटने की राह देखते हुए ख़ुद को ज़िंदा रखे हुए हैं। शायद वुजूद की सबसे आख़िरी ज़िद यही होती है, मौत के बाद भी अपने होने पर यक़ीन करते रहना। यहाँ मरने के बाद के नज़ारे बेहद जुदा हैं। मैं अपनी सफ़ेद पंखुड़ियों को अपनी ही आँखों के सामने काला पड़ते देख रहा हूँ। रंग उतर रहा है, ख़ुशबू जा रही है, और मेरे होने की आख़िरी निशानियाँ धीरे-धीरे मिट्टी में मिल रही हैं।

कल तक जो लोग मेरे सामने अपना गिरेबाँ निछावर करते थे, आज मेरी पंखुड़ियों पर पाँव रखकर आगे बढ़ जाते हैं। किसी को अब मेरी ख़ुशबू याद नहीं। किसी को यह भी याद नहीं कि कभी मैं उनके लिए ख़ूबसूरत था।
इस दुनिया की मोहब्बत भी फूलों जैसी थी ।जब तक शाख़ पर हो, तुम्हें चाहा जाता है; ज़मीन पर गिरते ही तुम्हारे ऊपर से गुज़र जाना सहज हो जाता है। अब मेरा क़ायम रहना फ़िज़ूल है। अब मैं किसी की आँखों को अच्छा नहीं लगता। अब मैं मोहब्बत के क़ाबिल नहीं रहा।

मैं बदसूरत-सा पड़ा अपनी ज़िंदगी को ख़त्म होते देख रहा हूँ और सोच रहा हूँ, क्या ख़ूबसूरती मुझमें थी, या सिर्फ़ शाख़ में?

मुझे मेरे वुजूद से मोहब्बत नहीं थी। मैं शायद तभी तक क़ीमती था,जब तक कोई और मुझे क़ीमती समझता रहा।

और मृत्यु ने यही आख़िरी सच बायाँ कि दिन दुनिया ने जब से मुझे देखना बंद किया है, उस दिन से मुझे अपने होने का भोझ दिखायी दे रहा है।

मैं आज मर गया हूँ।मगर मेरे मरने से ज़्यादा डरावनी बात यह है कि मेरे गिरने के बाद दुनिया को कुछ भी नहीं बदला।
दिशा 🌻

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