कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरी ज़िंदगी एक अजीब-सी यात्रा रही है,जहाँ मैंने हर उस चीज़ को पाने के लिए संघर्ष किया, जिसे लोग “उपलब्धि” कहते हैं। बचपन की उम्मीदों से लेकर बड़ी परीक्षाओं तक, सेवा में आने की लड़ाई से लेकर उस पद की ज़िम्मेदारियों तक। सबकुछ पाने की मेहनत की । लेकिन जितना मैंने पाया, उतना ही भीतर कुछ हल्का सा खालीपन भी जागता गया, जैसे मन धीरे से पूछ रहा हो, “क्या यही था वह शिखर, जिसकी इतनी भूख थी?”
और उसी खालीपन में मुझे एक गहरा सच समझ आने लगा कि पाने की आकांक्षा मुझे जितना खींचकर ऊपर ले जाती है, छोड़ने की इच्छा मुझे उतना ही भीतर ले जाती है। उपलब्धियों की भीड़ में खड़े होकर मैं अक्सर महसूस करती हूँ कि जो कुछ मैंने हासिल किया, वह ज़रूरी था, लेकिन अंतिम नहीं। वह मेरे सफ़र का हिस्सा था, मेरी पहचान का नहीं। कभी-कभी लगता है कि सबसे बड़ी आज़ादी यही है कि मैंने सबकुछ पाकर किसी चीज़ में क़ैद ना हूँ।
मेरे भीतर यह भावना दिन-ब-दिन स्पष्ट होती जा रही है कि मोक्ष कोई पहाड़ी आश्रम में बैठा शब्द नहीं है; वह मेरे अपने भीतर का एक धीमा, स्थिर अहसास है। वह क्षण है जब मैं समझती हूँ कि अगर आज चाहूँ, तो सबकुछ छोड़ सकने की ताकत मेरे भीतर है। यह ताकत ही शायद मेरा वास्तविक सम्पूर्ण होना है।
शायद मोक्ष मेरे लिए यह जान लेना है कि पाने की दौड़ में हार भी नहीं थी, जीत भी नहीं थी सिर्फ अनुभव थे। और अब, अनुभवों से भरे हाथों के साथ, उन्हें छोड़ने की इच्छा ही मेरी सबसे सच्ची स्वतंत्रता है।
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