
दुःख की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि उससे किसी की मृत्यु नहीं होती। मनुष्य दुःख से मरता नहीं, बस धीरे-धीरे छोटा होता जाता है। अपने ही भीतर सिकुड़ता हुआ, अपने अस्तित्व के किसी कोने में सिमटता हुआ। हम चींटियों जैसे छोटे जीव, हाथियों जितना भारी अपना दुःख माथे पर उठाए शहर-शहर भटकते रहते हैं। कोई नहीं देख पाता कि हमारी देह से कहीं अधिक थक चुका है हमारा भीतर।
धीरे-धीरे हम धरती में धँसने लगते हैं। अपने ही होने के बोझ तले, अपनी ही पीड़ा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से खिंचते हुए। हमारी व्यथाओं की जड़ें भीतर की मिट्टी में फैलती जाती हैं। हम उन्हें अपने आँसुओं से सींचते हैं, अपनी ख़ामोशियों से खाद देते हैं और अपनी अनकही बातों की धूप में बड़ा करते हैं। फिर एक दिन, अनजाने ही, हमारा दुःख एक वृक्ष बन जाता है। इतना विशाल कि उसकी छाया में हमारा शेष जीवन ढक जाता है।
उस वृक्ष पर अवसाद और विरक्ति के फल लगते हैं। हम उन्हें तोड़ते नहीं, बस अपने ही हाथों से उगाए होने के अपराधबोध में उन्हें देखते रहते हैं। कभी-कभी उनमें से एक फल भीतर गिरता है और हम कई दिनों तक यह तय नहीं कर पाते कि जो टूटने की आवाज़ हमने सुनी थी, वह किसी फल के गिरने की थी या हमारे भीतर बचे हुए किसी आख़िरी हिस्से की।
शायद दुःख का अंत होना ज़रूरी नहीं होता। शायद वह केवल अपना आकार बदलता है। पहले एक घटना होता है, फिर एक स्मृति, फिर एक स्वभाव और अंततः हमारे व्यक्तित्व का वह हिस्सा, जिसे हम अपने मूल स्वभाव की तरह स्वीकार कर लेते हैं। हम भूल जाते हैं कि कभी हम इसके बिना भी थे।
और इस तरह दुःख हमें मारता नहीं है। वह हमसे हमारा थोड़ा-थोड़ा अस्तित्व माँगता है, जब तक कि एक दिन हम जीवित तो रहते हैं, लेकिन अपने ही जीवन में पहले जितनी जगह नहीं घेरते।
दिशा 🌻
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