रूठी कलम

बहुत दिनों बाद कलम उठायी है। वो इसलिए नहीं कि लिखने का ज़रा सा भी इतेफ़ाक़ आया है मुझे। बल्कि इसीलिए की छूट रही है। छोड़ रही है लेखनी। लेखनी मुझे या मैं लेखनी को! पता नहीं।ये वाक्य लिखने में कितनी हिम्मत लगी, नहीं बता सकती। पर लगी। अब ये लिख के भी कलम मुझे पकड़ लेगी या रूठी ही रहेगी? नहीं पता। वो एहसास का एक आख़िरी नज़राना होता है ना। की गलती मान लेने पे महबूब थोड़ा कम नाराज़ होता है! कलम नाराज़ है ना! सिर्फ़ पूरा करने कि दौड़ में, कुछ भी, इधर उधर, कहीं से कुछ भी! जो पकड़ा दिया गया किसी के द्वारा, किसी के लिए। मसला ये है कि सिर्फ पूरा करने के लिए जीना कितना मुकम्मल है? नहीं पता। शायद अब चीज़ें पूरा करने की होड़ में, चीज़ें ख़ुद हो रही है। चीज़ें निगल रही हैं या मैं चीज़ों को घोंट रही हूँ। पता नहीं।अब बस सब कुछ पूरा करना है। सबकुछ बस ख़त्म करना है।असली मुद्दा ये है कि मैं उस लम्हे में क्या थी? मैंने क्या जिया? मैं किस बात पर रोई? कब हँसी? किस किस को जाकर अपनी झूठी सच्ची कहानी गायी? मैं ख़ुद से पूछ ही नहीं रही हूँ! मैं कितनी आगे आ गई हूँ और क्या क्या छोड़ चुकी हूँ, मैं क्यों नहीं पूछ रही? पता नहीं।हाँ माना की कुछ भी कभी पूरा करने वाली सीधी साधी फ़ितरत तो थी नहीं! पर शुरुआत तो थी।क्या यही ज़िंदगी है? मैं ऐसी तो ना थी! वाक़ये में खुदी के लिए वक़्त कितना मंहगा है! चार ग़ज़लें और दो मुकम्मल ख्याल लगते हैं। ये कैसी फ़ितरत है? जहाँ सब पाने की होड़ में, कुछ नहीं है। कुछ है, कुछ नहीं है।मैं हूँ, ग़ज़लें हैं, ख़याल शायद नहीं है। ख़्याल हैं, हम नहीं हैं। हाँ ये ज़्यादा ठीक है। मियाँ कुछ तो नाज़ुक मिजाज़ हैं हम भी। हम भी कलम से रूठ सकते हैं।क्यों? पर हमारी नाराज़गी का कोई पैमाना नहीं। शायद वो कलम के आगे मायने नहीं रखती। अच्छा चलो मान लिया। कलम मुझसे रूठी है। माना मुझसे ही रूठी है वो। मैंने वक्त नहीं दिया। मैंने उसको उठाया और स्याही नहीं भरी। चलो माना। पर प्यार भी तो मैंने ही ज़्यादा किया। उसका क्या? नहीं कौन समझायेगा उसको जाकर? क्या क्या करना है! क्या क्या करना था। पर सब हो तो रहा है। क्या इल्म है? सब हो तो रहा है। यही रफ़्तार है। यही ज़िंदगी की रफ़्तार है। इसमें कलम को कौन समझाये की ज़िंदगी और कलम के बीच कई बार मैंने ज़िंदगी चुनी है। पर मेरी मोहब्बत बेबुनियाद नहीं है।

दिशा🌻

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