Category: रौशनदान

  • July

    लिखने को कितना कुछ है।हर दिन मेरे आसपास कोई न कोई कहानी जन्म लेती है। कोई रिश्ता टूटता है, कोई उम्मीद बनती है, कोई सपना अपनी ही राख में बैठा अगली सुबह का इंतज़ार करता है। और मैं, अपनी ही नाकामियों में मुग्ध, उन्हें हार नहीं, बुलंदियों की सीढ़ियाँ समझकर जोड़ती चली जाती हूँ।ज़िन्दगी कभी रुककर नहीं घटती। वह तो परिस्थितियों के बहाने रोज़ अपना चेहरा बदलती रहती है। एक बैग, कुछ किताबें, कुछ कपड़े, और फिर सब बदल जाता है। नई जगह, नए लोग, नई फ़ाइलें, नए दस्तावेज़, नई ज़िम्मेदारियाँ। जैसे किसी ने पिछला अध्याय बिना विदा कहे बंद कर दिया हो।ठहराव हमें कभी दिया नहीं जाता; उसे धरती खोदकर निकालना पड़ता है। और अक्सर जब तक वह मिलता है, हम फिर किसी और सफ़र के लिए देर कर चुके होते हैं।
    आगे बढ़ना ही मनुष्य का सबसे बड़ा अभिशाप भी है और सबसे बड़ी मुक्ति भी।
    इश्क़ में आगे बढ़ना पड़ता है।
    काम में भी।
    नाकामियों में भी।
    धूप में, बरसात में।
    शायद जुलाई इसी का नाम है। आगे पढ़ने का, आगे बढ़ने का। जैसे किताब का कोई ऐसा अध्याय जिसे पढ़ना मन नहीं करता, फिर भी पलट देना पड़ता है, क्योंकि कहानी किसी एक पन्ने पर हमेशा के लिए नहीं ठहरती।
    मुझे चलना अच्छे से आता है। मैं वक़्त की चादर ओढ़ लेती हूँ और उसकी सुइयों से पड़ी सलवटों को चुपचाप समेटती चल देती हूँ। पीछे छूट जाती हैं कुछ रातें, इतनी ख़ामोश कि उनमें अपनी ही साँसें परायी लगने लगें। कुछ चेहरे, जो अब नाम से ज़्यादा एहसास रह गए हैं।
    फिर भी वक़्त बड़ा निर्दयी चित्रकार है। वह सबसे गहरे रंगों को भी धीरे-धीरे धुँधला कर देता है। यादें अंततः स्मृति नहीं रह जातीं, केवल आदत बन जाती हैं।
    आख़िर कितनी देर कोई एक ही चक्र में रह सकता है?नदियाँ भी अपने ही पानी में दोबारा नहीं लौटतीं।
    शायद जीवन का अर्थ किसी को हमेशा के लिए पा लेना नहीं, बल्कि जब तक वह साथ हो, उसे पूरे वर्तमान के साथ जी लेना है। क्योंकि अंत में हमारे पास लोग,जगहें, वक़्त नहीं बचते उनके साथ जिए हुए क्षण बचते हैं। वही दोपहरें, वही लंबी बातचीतें, वही साथ की ख़ामोशियाँ, जिनमें शब्दों की कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी। वक़्त सबको अपने साथ ले जाता है, पर वर्तमान में पूरी तरह जिया गया एक पल, स्मृति में नहीं, हमारे स्वभाव में बस जाता है। शायद इसी तरह कुछ लोग चले जाने के बाद भी कहीं नहीं जाते। वे हमारे भीतर रहने लगते हैं। हमारी नज़र में, हमारी भाषा में, हमारी ख़ामोशियों में। अंततः जीवन में स्थायी यदि कुछ है, तो वह साथ नहीं, साथ होने का अनुभव है।

    दिशा 🌻

  • मोक्ष

    कभी-कभी मुझे लगता है कि मेरी ज़िंदगी एक अजीब-सी यात्रा रही है,जहाँ मैंने हर उस चीज़ को पाने के लिए संघर्ष किया, जिसे लोग “उपलब्धि” कहते हैं। बचपन की उम्मीदों से लेकर बड़ी परीक्षाओं तक, सेवा में आने की लड़ाई से लेकर उस पद की ज़िम्मेदारियों तक। सबकुछ पाने की मेहनत की । लेकिन जितना मैंने पाया, उतना ही भीतर कुछ हल्का सा खालीपन भी जागता गया, जैसे मन धीरे से पूछ रहा हो, “क्या यही था वह शिखर, जिसकी इतनी भूख थी?”

    और उसी खालीपन में मुझे एक गहरा सच समझ आने लगा कि पाने की आकांक्षा मुझे जितना खींचकर ऊपर ले जाती है, छोड़ने की इच्छा मुझे उतना ही भीतर ले जाती है। उपलब्धियों की भीड़ में खड़े होकर मैं अक्सर महसूस करती हूँ कि जो कुछ मैंने हासिल किया, वह ज़रूरी था, लेकिन अंतिम नहीं। वह मेरे सफ़र का हिस्सा था, मेरी पहचान का नहीं। कभी-कभी लगता है कि सबसे बड़ी आज़ादी यही है कि मैंने सबकुछ पाकर किसी चीज़ में क़ैद ना हूँ।

    मेरे भीतर यह भावना दिन-ब-दिन स्पष्ट होती जा रही है कि मोक्ष कोई पहाड़ी आश्रम में बैठा शब्द नहीं है; वह मेरे अपने भीतर का एक धीमा, स्थिर अहसास है। वह क्षण है जब मैं समझती हूँ कि अगर आज चाहूँ, तो सबकुछ छोड़ सकने की ताकत मेरे भीतर है। यह ताकत ही शायद मेरा वास्तविक सम्पूर्ण होना है।

    शायद मोक्ष मेरे लिए यह जान लेना है कि पाने की दौड़ में हार भी नहीं थी, जीत भी नहीं थी सिर्फ अनुभव थे। और अब, अनुभवों से भरे हाथों के साथ, उन्हें छोड़ने की इच्छा ही मेरी सबसे सच्ची स्वतंत्रता है।

  • रूठी कलम

    बहुत दिनों बाद कलम उठायी है। वो इसलिए नहीं कि लिखने का ज़रा सा भी इतेफ़ाक़ आया है मुझे। बल्कि इसीलिए की छूट रही है। छोड़ रही है लेखनी। लेखनी मुझे या मैं लेखनी को! पता नहीं।ये वाक्य लिखने में कितनी हिम्मत लगी, नहीं बता सकती। पर लगी। अब ये लिख के भी कलम मुझे पकड़ लेगी या रूठी ही रहेगी? नहीं पता। वो एहसास का एक आख़िरी नज़राना होता है ना। की गलती मान लेने पे महबूब थोड़ा कम नाराज़ होता है! कलम नाराज़ है ना! सिर्फ़ पूरा करने कि दौड़ में, कुछ भी, इधर उधर, कहीं से कुछ भी! जो पकड़ा दिया गया किसी के द्वारा, किसी के लिए। मसला ये है कि सिर्फ पूरा करने के लिए जीना कितना मुकम्मल है? नहीं पता। शायद अब चीज़ें पूरा करने की होड़ में, चीज़ें ख़ुद हो रही है। चीज़ें निगल रही हैं या मैं चीज़ों को घोंट रही हूँ। पता नहीं।अब बस सब कुछ पूरा करना है। सबकुछ बस ख़त्म करना है।असली मुद्दा ये है कि मैं उस लम्हे में क्या थी? मैंने क्या जिया? मैं किस बात पर रोई? कब हँसी? किस किस को जाकर अपनी झूठी सच्ची कहानी गायी? मैं ख़ुद से पूछ ही नहीं रही हूँ! मैं कितनी आगे आ गई हूँ और क्या क्या छोड़ चुकी हूँ, मैं क्यों नहीं पूछ रही? पता नहीं।हाँ माना की कुछ भी कभी पूरा करने वाली सीधी साधी फ़ितरत तो थी नहीं! पर शुरुआत तो थी।क्या यही ज़िंदगी है? मैं ऐसी तो ना थी! वाक़ये में खुदी के लिए वक़्त कितना मंहगा है! चार ग़ज़लें और दो मुकम्मल ख्याल लगते हैं। ये कैसी फ़ितरत है? जहाँ सब पाने की होड़ में, कुछ नहीं है। कुछ है, कुछ नहीं है।मैं हूँ, ग़ज़लें हैं, ख़याल शायद नहीं है। ख़्याल हैं, हम नहीं हैं। हाँ ये ज़्यादा ठीक है। मियाँ कुछ तो नाज़ुक मिजाज़ हैं हम भी। हम भी कलम से रूठ सकते हैं।क्यों? पर हमारी नाराज़गी का कोई पैमाना नहीं। शायद वो कलम के आगे मायने नहीं रखती। अच्छा चलो मान लिया। कलम मुझसे रूठी है। माना मुझसे ही रूठी है वो। मैंने वक्त नहीं दिया। मैंने उसको उठाया और स्याही नहीं भरी। चलो माना। पर प्यार भी तो मैंने ही ज़्यादा किया। उसका क्या? नहीं कौन समझायेगा उसको जाकर? क्या क्या करना है! क्या क्या करना था। पर सब हो तो रहा है। क्या इल्म है? सब हो तो रहा है। यही रफ़्तार है। यही ज़िंदगी की रफ़्तार है। इसमें कलम को कौन समझाये की ज़िंदगी और कलम के बीच कई बार मैंने ज़िंदगी चुनी है। पर मेरी मोहब्बत बेबुनियाद नहीं है।

    दिशा🌻

  • अधूरे लेख

    मेरी डायरी में इस वक्त इतनी अधूरी कविताएँ हैं, इतने अधूरे लेख हैं, कि मैं अधूरे लेखों पे लिख रही हूँ । बहुत कमाल के लोग होते हैं जो सब अंत तक पहुँचाने का जोश और एकाग्रता रखते हैं। मुझ जैसे विचलित लेखक से रोज़ रात बिस्तर में कलम ख़ुद दो दफ़े पूछती है, कभी ख़त्म कर पाओगी? कुछ भी? कोई अधूरी लड़ाई, कोई अधूरा सीखा हुआ नृत्य, कोई पुराना याराना, कल वाली वो बात, ऑफिस के काम, अपना श्रृंगार या ये लेख? कुछ भी? जवाब में मैं अपने बचे सारे होश हवास समेट कर,आधी रात को,कलम को ठेंगा दिखाते हुए जब उठती हूँ, तो मेरा रिकॉर्ड रहा है, कुछ नया अधूरा पनप ज़रूर जाता है ।आज तक कभी कुछ पूरा नहीं हुआ। कलम को खुश करने के चक्कर में डायरी अलग रूठ बातें बनाना शुरू करदेती है, मेरा कुछ तो लाज कर लो! कितने पन्ने खाली पड़े हैं? अब कुछ नया लिखने की ज़रूरत नहीं है। पहले ये सब पूरा करो ।

    क्या पूरा करदूँ? बताओ मुझे कोई? मुझे ख़ुद किसी भी शुरुआत का अंत नहीं पता । मुझे ख़ुद किसी कहानी को कैसे ख़तम करना है, नहीं पता । बिल्कुल नहीं पता । बस इसी उम्मीद में कि कभी तो डायरी कलम ख़ुश होकर मुझे कोई खोया एक गुलाब ईनाम में देंगे लिखने का सतत प्रयास करती हूँ पर बदले में मिलता वोही है, एक और अधूरा लेख।

    दिशा।🌻

  • मेरी नीली पतंग!

    पतंग हमेशा से भाती थी। बचपन में पापा के ऑफिस से आ जाने से पहले, मतलब तक़रीबन पाँच से छह बजे के बीच, अगल बगल के कई बच्चे अपनी अपनी छत पे एक सफेद रेशमी डोर पकड़े लाल पीली हरे रंगों की पतंग आकाश में लहरा रहे होते थे। उन पतंगों पे अलग अलग तरह की सुंदर तस्वीरें बनी थीं। कहीं पे कोई आने वाली नई पिक्चर की झलक, कहीं पे मेरा सबसे पसंदीदा कार्टून टॉम एंड जेरी, कहीं पे कोई शेरों शायरियां तो कहीं पे चुटकुले। क्या सुंदर दृश्य हुआ करता है। आज भी हुबहू याद है। और उन सबमे सबसे सुंदर वो नीली पतंग! हवा के वेज से लहराती, ना गिरती ना कटती, अपनी छोर पे गोटे टांगे, पूरी आसमान के रंग की, आसमान की ही तरह, आसमान की परी जैसी वो नीली पतंग! मैं दसों पतंगों में बस उसी को निहारती रहती थी। रोज़ अपनी दिनचर्या के हिसाब से शाम पाँच से छह बजे तक आसमान की सैर करती। सभी पतंगें उसे काटने को आतुर रहतीं, मजाल है वो किसी के हाथ आए। लंबे पेड़ उसे बस हवा देते, उसका बिगाड़ तो कोई कुछ नहीं पता था।
    इक शाम की कहानी है। मैं छत पे खड़ी अपने बाल संवार रही थी पर मेरी नज़रें आसमान में उड़ती उन सभी पतंगों में बस अपनी नीली पतंग को निहारने में गुम थीं। मुझे वो हवा में डोलती, उसके वेग में मचलती बहुत मनमोहक लग रही थी। उस दिन मौसम थोड़ा विपरीत था। हवा तेज़ थी जो आंधी का रूप ले चुकी थी। आसमान का श्रृंगार ख़राब हो रहा था, सारी पतंगें इधर उधर लड़ कर या गिर रही थीं या कहीं फँस कर अपना अंतिम संस्कार कर रही थीं।
    मैं भी नीचे जाने की तैयारी में थी। बाल बाँधे, चप्पल पहनी, कान से इयरफोन्स निकाले और पीछे मुड़ी। पीछे शेड के बगल में कोई झाँक रहा था। मैंने ध्यान से देखा तो वो वही नीली पतंग थी। मेरी नीली पतंग।
    दौड़ के मैंने उसको अपनी गोद में उठा लिया। गले से लगा लिया।मैंने उसको जी भर के निहारा। उस आँधी में मैं छत पे खड़ी एक पतंग को ऐसे निहार रही थी जैसे कोई प्रेम पत्र हो।
    अब मेरे पास दो विकल्प थे। मैं आराम से उसे लेकर नीचे ले जा अपने ड्राइंग रूम में सजा उसे दिन रात बैठ निहार सकती थी।या छोड़ सकती थी उसको। जाने दे सकती थी उसको उसके आसमान के पास।
    मैंने दो पल सोचा। इतना काफ़ी था। मैं निर्णय कर चुकी थी। मैं ज़ोर से भागी और अपनी पूरी ताक़त से अपनी सबसे पसंदीदा नीली पतंग को आसमान की तरफ़ उछाल दिया। उसका माँझा कसा। वो उड़ने लगी, वो आंधी में अपने तूफ़ान से उड़ने लगी। मेरी नीली पतंग, अपने आसमान का श्रृंगार करते मुझे देख मुस्कुरा रही थी।

  • मैं ख़ुद एक किताब

    मैं ख़ुद एक किताब

    किताबों की भीड़ में मैं एक किताब खोज रही थी। उसे खोजते खोजते न जाने कितनी किताबें पढ़ डालीं। आज भी सबकी खुश्बू याद है मुझे। हर किताब की अपनी अलग गंध थी। कहीं पन्नों के बीच दबा कमल था, कहीं सूख चुका गुलाब, जिसकी पंखुड़ियाँ अब भी किसी पुराने प्रेम पत्र की तरह शब्दों से लिपटी हुई थीं। मैंने उन फूलों के डंठल तक संभालकर रखे थे, जैसे वे किसी बीत चुकी ऋतु की हड्डियाँ हों।धीरे धीरे मुझे एहसास हुआ कि शायद मैं किताबों को नहीं पढ़ रही थी। शायद किताबें मुझे पढ़ रही थीं। मैं तो बस एक दर्शक थी, अपने भीतर खुलते हुए अध्यायों को देखती हुई। कहीं टॉल्सटॉय युद्ध और शांति के बीच मनुष्य की असहायता का अर्थ समझा रहे थे, कहीं ययाति अपनी अतृप्त इच्छाओं का बोझ उठाए मुझे उन युगों में ले जा रहा था जहाँ नियति और लालसा एक दूसरे का गला घोंटती रहती हैं। कहीं कोई देवता मेरे पुण्यों का हिसाब लगा रहा था, तो कहीं कोई दैत्य मेरे गुनाहों को एक एक कर गिनकर मुझे बता रहा था कि दोनों के बीच की दूरी उतनी नहीं होती जितनी कथाएँ हमें यक़ीन दिलाती हैं।

    मैं पढ़ी जा रही थी। परत दर परत। शब्द दर शब्द। जैसे कोई प्राचीन ग्रंथ मेरी आत्मा के हाशियों पर झुककर नोट्स लिख रहा हो।फिर एक दिन वह किताब मिली, जिसके किसी साधारण से पन्ने पर तुम्हारा ज़िक्र था।

    अजीब बात है, उससे पहले तक मैंने अनगिनत किताबें पढ़ी थीं, पर शायद पहली बार किसी किताब को पढ़ा था। मैं उसके भीतर उतरती चली गई। उसके रेशे रेशे को, उसकी स्याही की नमी को, उसके शब्दों की धड़कन को। पहली बार लगा कि किताबें केवल विचारों का घर नहीं होतीं, वे कभी कभी किसी मनुष्य का पुनर्जन्म भी होती हैं।शायद पहली बार मुझे किताबों से प्रेम हुआ। या शायद पहली बार किताबों ने मुझसे प्रेम किया।

    उसके बाद मैं तुम्हें पढ़ती गई। पढ़ती गई। और जितना पढ़ती गई, उतना ही अपने भीतर नई कहानियाँ बुनती गई। उन कहानियों में युद्ध थे, जिनमें सेनाएँ नहीं, स्मृतियाँ लड़ती थीं। प्रेम था, जो गुड़हल के फूलों के रस की तरह उतरता था। सृजन था, सृष्टि थी, ब्रह्मांड था, तारों की अनगिनत मृत रोशनियाँ थीं, और उनके बीच भटकती हुई मैं थी।
    पढ़ते पढ़ते मैं ख़ुद एक किताब बन गई थी। एक ऐसी किताब, जिसके कुछ पन्नों पर अब भी तुम्हारा नाम लिखा है, और बाकी पन्नों पर तुम्हारी अनुपस्थिति।
    दिशा 🌻

  • दुख को प्रेमपत्र

    दुख को प्रेमपत्र

    मैं मिलों मील चल रही हूँ। तुमसे दूर जाने के हर्षक प्रयास में रोज़ विफल हूँ। तुम्हारा होना मेरे संघर्षों की रगों में चुभता रहता है। तुम मेरे सबसे घनिष्ठ मित्र और मेरी हर अधूरी बातों का मुकम्मल जवाब हो।इस पल मेरे जीवन के हर मूलभूत भाव के जनक, तुम। मेरे हर उस भाववाचक संज्ञा को जन्म देते तुम, जो मैंने कक्षा छह में पढ़ी थी और बाक़ी बचें हर उस भाव, भावना जो मैंने किसी भी कक्षा में नहीं पढ़ी। मुझे कभी सिखाई नहीं गई। तुमसे उत्पन्न कितनी ही भावनाओं को संज्ञानित कर सकती हूँ मैं? शायद हज़ारों।
    पर मुझे तुमसे दूर जाना है। मिलों दूर। कुछ हज़ार नौ सौ किलोमीटर।मैं कभी मान नहीं सकती कि मैं तुमसे दूर जाना नहीं चाहती। तुम अनपेक्षित हो, अप्रत्याशित हो, अकल्पित हो।

    अच्छ! मुझे किसी भी कक्षा में नहीं पढ़ाया गया कि दुख के विशालकाय पेड़ की शाखाओं पे हरी पत्तियाँ भी है पीली भी हैं और कुछ भूरी हैं। दुख का पेड़ मरुस्थल में अकेले खड़ा सभी को राह दिखाता हुआ अपनी जड़ें, जंतु के जन्म से जोड़े खड़ा है।
    मैं मोहग्रस्त तुम्हारी ही शाखाओं पे बैठ तुमसे ही दूर कहीं दूर निकलने की तलाश में हूँ। इस बात से पूर्णतः अनजान कि मैं जिससे दूर भाग रही हूँ उसी पर सवार हूँ, उसी की पत्तियों को चबा रही हूँ, उसी का रस घोंट रही हूँ और तुम कबका मेरी चेतना के मूल तत्व बन चुके हो। अब तुम्हारे बिना जीवन बेरंग, बेरस, बेबस है।
    तुमसे विशालकाय कुछ नहीं। तुम से सर्वोपरि और कुछ नहीं। तुमको जस का तस अपनाना ही एकमात्र उपाय नज़र आता है। इसी उपाय से सुख की उत्पत्ति होती है। तुमसे ही प्रेम है, भोग है, विलास है, विच्छाद है, अपनापन है, उम्मीद है, उत्साह है, करुणा है, पछतावा है, विरक्ति है, तड़प है, विद्रोह है, विस्मय है। मेरी आत्मा में जन्म लेने वाली हर भावना का स्रोत तुम ही तो हो। तुम हो तो मैं ये महसूस कर पा रही हूँ की मैं भी कहीं ना कहीं हूँ।
    तुमसे दूर जाने की कोशिश समंदर के विरुद्ध चलती उस कश्ती जैसी है, जिसे आख़िरकार तुम्हारी ही शाखाएँ किनारे का पता बताती हैं। मैं तुमसे दूर होकर भी तुम्हीं तक लौट आने के लिए बनी हूँ।
    दिशा🌻

  • मृगतृष्णा

    मृगतृष्णा

    आज कल से बेहतर था। आज उसकी याद सुबह उठने के बाद थोड़ी कम आई। शायद कुछ ३ प्रतिशत कम। शायद। मैं धीरे धीरे उसे भुलाने के प्रयास में, उसकी स्मृतियाँ चेतन से अवचेतन मस्तिष्क में ढकेल रही हूँ। मैं अपने प्रयासों में सार्थक हो रही हूँ, ये मुझे चोट कर रहा है। इन्ही प्रयासों में एक दिन ऐसा आजायेगा कि वो मुझे दिन भर नहीं याद आयेगा, दिन भर वो मेरे मन मस्तिष्क में टहलता नहीं रहेगा। अब वो बस स्मृतियों में पनपेगा। कभी कमल बन तो कभी कछुए की तरह। कभी कभी स्मृतियाँ जीवन बन सामने आ खड़ी हो जायेंगी। कभी किसी कीड़े मकोड़े, कभी कोई अट्रैंडम छिपकली, कभी सूरजमुखी, कभी रौशनदान और कभी कोई कविता की पुरानी किताब। अब वो इन सभी मज़बूत लम्हों में ज़िंदा रहेगा।
    वो ज़िंदा होगा ही अपनी ज़िंदगी में। साँस लेता, उठता- बैठता, मज़ाक़ करता, ठहाके लगता। कभी देर से उठता, कभी जल्दी उठ फिर सो जाता। तयार होता, टाई लगाता, फूल ख़रीदता, किताबें पढ़ता। घर परिवार से बात चीत करता। नए दोस्त बनाता।
    उसे मेरे होने ना होने से तिनके मात्र भी फ़रक नहीं पड़ेगा। मैं उसकी चेतना से कहीं दूर अपनी कब्र बिछा चुकी होऊँगी। उसकी ज़िंदगी में उत्सव आयेंगे, जलसे होंगे, शोक विषाद दौड़ेगा, वो सब झेल लेगा। मैं कहीं दबती चली जाऊँगी। स्टेशन पे पड़ी पुरानी किताब की दुकान में सबसे पुरानी किताब के नीचे। थोड़ी फटी, थोड़ी कुचली।
    उसी स्टेशन की उस रोज़ आती जाती गाड़ियों में से एक 'मैं' होंगी। जो रोज़ अपने सामर्थ्य से दोगुने यात्रियों को उठा, उन्हें जैसे तैसे अपने गंतव्य पर पहुचाती है। ज़िंदगी की पटरियों पे दौड़ती साँसों को अब नए आयामों से संजो यात्री अपनी ट्रेन की वाहवाही करेंगे। नए नए मंज़र गुज़रेंगे। कभी पहाड़, कभी झरने, कभी नदी कभी पीपल का पेड़ कभी रेगिस्तान। मैं सबसे गुज़रती जाऊँगी। अपने जीवन के हर मरुस्थल को पार कर मैं अपनी मृगतृष्णा से मिलूँगी। वहाँ रुकूँगी और दो पल रुक कर फिर आगे बढ़ जाऊँगी। मृगतृष्णा से अवबोध मुझे मेरे सपनों की याद दिलाएगा। अवचेतन मस्तिष्क मुझे फिर से प्रेम की समुद्री झील में धकेल कल्पना की कुटिया बना पुकारेगा। मैं अपनी चेतना को संभाल, उसके प्रताप को लपेट, यादों के कंकड़ को झील में फेंकते हुए, फिर सदर पे आगे बढ़ जाऊँगी। सिर्फ़ इसी आस में कि वो भी कहीं सफ़र में ही होगा!
    दिशा 🌻

  • मैं बनारस हूँ

    मैं बनारस हूँ

    मैं बनारस हूँ। पीता हूँ, खाता हूँ, और चुपचाप सब पचा भी जाता हूँ। मैं बनारस का बुद्ध हूँ, पर ज्ञान बाँटने का कोई आग्रह नहीं रखता, जो समझना होता है, वह अपने आप भीतर उतर ही जाता है। मैं ज़्यादा कुछ नहीं जानता, बस इतना जानता हूँ कि जो नया दिखता है, वह अक्सर बहुत पुराना होता है, और मैं उसी पुरातन का धैर्य हूँ।

    मैं धूप में, छाँव में, बारिश में, ओलों में, यूँ ही स्थित रहता हूँ। समय मेरे पास से गुजरता है, मैं उसके पीछे नहीं भागता। मैं भींग चुका हूँ,मन्नतों से, आँसुओं से, पान की लाली से, भीगे आँचल की हल्की सी गंध से। इन सबने मुझे गीला नहीं, थोड़ा और गहरा बना दिया है।

    मैं गुमसुम सा बैठा हूँ, किसी विशेष प्रतीक्षा में नहीं, पर ठहराव में एक अजीब सी आदत होती है, वह खुद ही इंतज़ार बन जाती है। मैं अपनी गंगा का किनारा हूँ, और उसी के साथ बहता भी हूँ, ठहरा भी रहता हूँ। मैं कभी-कभी खो जाता हूँ, पर यह खोना भी कोई विछोह नहीं, उसी में मैं फिर से अपने भीतर उतरता हूँ और खुद को यूँ ही पा लेता हूँ।

    मुझे सभ्यता की स्वेटर पसंद है, एक सलीका, एक आवरण, पर भीतर कहीं रॉक संगीत की अनगढ़ धुनें भी चलती रहती हैं। मैं ठेठ पियक्कड़ हूँ, थोड़ा आवारा भी, और इन दोनों में कोई विरोध नहीं देखता। सदियों से खुद को ही खोज रहा हूँ, अपनी ही नाभि में शोर और शांति को बाँधकर रखा है। कभी मैं शोर बन जाता हूँ, कभी शांति, और इन्हीं दोनों के बीच मैं तुम और तुम पूरे बनारस बन जाते हो।

    दिशा🌻