मैं बनारस हूँ। पीता हूँ, खाता हूँ, और चुपचाप सब पचा भी जाता हूँ। मैं बनारस का बुद्ध हूँ, पर ज्ञान बाँटने का कोई आग्रह नहीं रखता, जो समझना होता है, वह अपने आप भीतर उतर ही जाता है। मैं ज़्यादा कुछ नहीं जानता, बस इतना जानता हूँ कि जो नया दिखता है, वह अक्सर बहुत पुराना होता है, और मैं उसी पुरातन का धैर्य हूँ।
मैं धूप में, छाँव में, बारिश में, ओलों में, यूँ ही स्थित रहता हूँ। समय मेरे पास से गुजरता है, मैं उसके पीछे नहीं भागता। मैं भींग चुका हूँ,मन्नतों से, आँसुओं से, पान की लाली से, भीगे आँचल की हल्की सी गंध से। इन सबने मुझे गीला नहीं, थोड़ा और गहरा बना दिया है।
मैं गुमसुम सा बैठा हूँ, किसी विशेष प्रतीक्षा में नहीं, पर ठहराव में एक अजीब सी आदत होती है, वह खुद ही इंतज़ार बन जाती है। मैं अपनी गंगा का किनारा हूँ, और उसी के साथ बहता भी हूँ, ठहरा भी रहता हूँ। मैं कभी-कभी खो जाता हूँ, पर यह खोना भी कोई विछोह नहीं, उसी में मैं फिर से अपने भीतर उतरता हूँ और खुद को यूँ ही पा लेता हूँ।
मुझे सभ्यता की स्वेटर पसंद है, एक सलीका, एक आवरण, पर भीतर कहीं रॉक संगीत की अनगढ़ धुनें भी चलती रहती हैं। मैं ठेठ पियक्कड़ हूँ, थोड़ा आवारा भी, और इन दोनों में कोई विरोध नहीं देखता। सदियों से खुद को ही खोज रहा हूँ, अपनी ही नाभि में शोर और शांति को बाँधकर रखा है। कभी मैं शोर बन जाता हूँ, कभी शांति, और इन्हीं दोनों के बीच मैं तुम और तुम पूरे बनारस बन जाते हो।
दिशा🌻
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