सुनहरी गुम इक शाम
मरे हुए आकाशीय पदार्थ
बिखरी रोशिनी के टुकड़े
चाँदनी सी चमकती आँखें।
कुछ ढूँढती पलकें भौहें
कुछ नमी जमी रूह
गले तक रुके लफ़्ज़
स्वेटर से झाँकती उँगलियाँ।
चंचल हवा मदमस्त चाल
अंजान रुख बेगानी दिशा
धब्बे धारियाँ लैश चाँद
अनंत आखेट शून्य क्षितिज।
सफ़ेद बीच कड़े बाल
स्लेटी साड़ी रजत घड़ी
चौड़े माथे काली बिन्दी
पतली पाजेब ऊँची जूती।
गहरी माथे की रेखाएँ
काली आधी बिखरी शॉल
तन को ढकती चाँदनी
सिमटा बदन बिखरा रूप।
गुज़रती रेल थरथराता पुल
चमकता शीशे का ग्लास
डोलती बर्फ हथेली व्हिस्की
ढलती उमर चढ़ता नशा।
शून्य निहारते पथराये नैन
कावेरी में डोलता प्रतिबिंब
जलमग्न उतरती अदृश्य सीढ़ियाँ
मंद लहरों का वाद विवाद।
अपनाने की छमता दृढ़य
स्थिरता का अविचलित विवेक
सोयी सी लाल नाक
खूबसूरत बेरुखी सी रात।
ठहरा हुआ भागता वक़्त
सुइयों से चुराए सेकंड
दौड़ती ज़िंदगी शीतल पंजे
उलझा और खूबसूरत अंत।
दिशा🌻
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