मेरी हद ये है कि
मेरी कोई हद नहीं
ना प्यार में ना इकरार में
दुश्मनी में दोस्ती में
मेरी कोई हद नहीं।
जितना सुकून खुद को बना देने में है
शायद उतना ही पूरी तरह मिटा देने में भी।
ये इतिहास में ईंसाफ़ में ताकीज़े
इकरार में फनकार में
मेरी कोई हद नहीं है।
मैं जगह जगह जाऊँ हाथ मिलाऊँ
सब सबके मुताबिक लिख दूँ
लोग तमीज़दार बोले गाली गलौच करें,
मुझे इंसानियत की हद याद दिलाए
पर मैं हद ना खोज पाऊँ।
ना जाने कहाँ गिरूँ
कंकड़ खाऊँ लोग भगायें
फ़कीर बन चौखट चौखट
अल्लाह से खुद को माँगूँ
लोग पागल का दर्जा दे
सिर फोड़ दे दूर भगां
बेहद का सिरफिरा घूम रहा है गाँव गाँव
पर मैं अपनी हद ना खोज पाऊँ।
शायद,
मेरी हद ये है
कि मेरी कोई हद नहीं।
ना इंसानियत में ना हैवानियत में
ना बुद्ध में ना कृष्ण में।
मेरी कोई हद नहीं है।
दिशा 🌻
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