सूरत-ए-हाल की क़बूलियत

मोहब्बत से बड़ा क्या है? क्या कभी कुछ मोहब्बत से वसीअ हो सकता है? क्या किसी रूहानी या जिस्मानी चीज़ का कोई वुजूद है, जो मोहब्बत से आगे ठहर सके?

मोहब्बत के नाज़ुक बाज़ुओं में सिमटे सुकून, उसकी पुरज़ोर बेचैनी और बेतकल्लुफ़ जुनून के सामने इस अज़ीम ज़मीन और आसमान में कुछ और तलाशना कितना दुश्वार है। हर लम्हे का पागलपन, हर सुपुर्दगी, हर वहशीपन, हर उनसीयत, वो जुनून, वो जज़्बात, कितने अज़ीज़, कितने बेपरवाह और कितने मुकम्मल।

मोहब्बत से अज़ीम कुछ भी नहीं।

कुछ भी नहीं।

सिवाय सूरत-ए-हाल की क़बूलियत के।

दिशा 🌻

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